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AMU के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत: जमात-ए-इस्लामी हिंद

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AMU के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत: जमात-ए-इस्लामी हिंद

Welcome the Supreme Court’s decision on AMU’s minority status: Jamaat-e-Islami Hind

नई दिल्ली: जमात-ए-इस्लामी हिंद (JIH) के अध्यक्ष सैयद सादातुल्लाह हुसैनी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के अल्पसंख्यक दर्जे को बरकरार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. मीडिया को दिए एक बयान में JIH अध्यक्ष ने कहा, “1967 में एस. अजीज बशा बनाम भारत संघ मामले में आए फैसले में कहा गया था कि कानून द्वारा स्थापित कोई भी संस्था अल्पसंख्यक संस्था होने का दावा नहीं कर सकती, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर पुनर्विचार करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है.

यह फैसला कई ऐसी संस्थाओं के अल्पसंख्यक स्वरूप को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होगा, जिन्हें कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था और उनके शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधिकार, जिन्हें संविधान ने मान्यता दी है, गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे थे. यह फैसला देश के सभी धार्मिक, भाषिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन का मार्ग प्रशस्त करेगा.

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस मामले को ‘विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की और इसके पीछे किसके प्रयास थे’ इसकी जांच के लिए नियमित पीठ को भेज दिया है, इसलिए हमें विश्वास है कि AMU का अल्पसंख्यक दर्जा अदालत में बरकरार रहेगा. इतिहास स्पष्ट रूप से बताता है कि सर सैयद अहमद खान ने अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की शैक्षिक प्रगति के लिए AMU की स्थापना की थी.”

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सैयद सादातुल्लाह ने कहा, “हमें उम्मीद है कि सरकार और स्थानीय प्राधिकरण यह समझेंगे कि अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमान, भारत का अभिन्न अंग हैं और उनके शिक्षा, आजीविका, सुरक्षा और संरक्षण के मूलभूत अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए. भारत के मुसलमानों ने हमेशा देश की प्रगति में सकारात्मक योगदान दिया है और उनकी शैक्षणिक संस्थाओं ने बिना किसी जाति या धर्म के भेदभाव के छात्रों की सेवा की है.

अल्पसंख्यकों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हमेशा अदालत का दरवाजा न खटखटाना पड़े, इसके लिए सरकार को अपना रुख बदलना चाहिए.
सरकार को अल्पसंख्यकों को अपने विकास के एजेंडे में सक्रिय रूप से शामिल करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें किसी भी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े. इसमें उनकी संस्थाओं की रक्षा करना और उन्हें आवश्यक रियायत देना, सकारात्मक कार्रवाई को प्रोत्साहित करना और उनकी गिरती सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए लाभ प्रदान करना जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं. किसी भी लोकतांत्रिक देश की पहचान ऐसे उपाय धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रदान करना है.”

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Imran Siddiqui

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