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रूह अफजा: ताजगी, परंपरा, और विवादों की कहानी

रूह अफजा: ताजगी, परंपरा, और विवादों की कहानी

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रूह अफजा: ताजगी, परंपरा, और विवादों की कहानी

रूह अफजा: ताजगी, परंपरा, और विवादों की कहानी

रूह अफजा, भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का एक ऐसा पेय है, जो हर गर्मी और उत्सव में घर-घर में मौजूद होता है। इसका नाम, जो फारसी में “आत्मा को तरोताजा करने वाला” अर्थ रखता है, इसके स्वाद और प्रभाव को पूरी तरह दर्शाता है। एक सदी से भी अधिक समय से यह शरबत न केवल प्यास बुझाता है, बल्कि संस्कृति, परंपरा और भावनाओं का प्रतीक भी है। हाल ही में, रूह अफजा उस समय सुर्खियों में आया जब योग गुरु बाबा रामदेव ने इसे लेकर एक विवादास्पद बयान दिया। आइए, रूह अफजा के इतिहास, इसके सांस्कृतिक महत्व, और इस ताजा विवाद की गहराई में जाएं।

उत्पत्ति: यूनानी चिकित्सा का तोहफा

रूह अफजा की कहानी 1906 में दिल्ली के चांदनी चौक से शुरू होती है, जहां हकीम हाफिज अब्दुल मजीद ने इसे पहली बार तैयार किया। यूनानी चिकित्सा के विशेषज्ञ हकीम मजीद का मकसद एक ऐसा पेय बनाना था जो गर्मी से राहत दे, पाचन को बेहतर करे, और शरीर को ऊर्जा प्रदान करे। उस समय दिल्ली की गर्मियां असहनीय थीं, और लोग प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक पेय की तलाश में रहते थे।

हकीम मजीद ने प्रकृति के खजाने का सहारा लिया और गुलाब, चंदन, खस, पुदीना, तरबूज, गाजर, अनानास, और कई जड़ी-बूटियों का मिश्रण तैयार किया। गुलाब का अर्क इसकी आत्मा बना, जो इसे अनूठी सुगंध और स्वाद देता है।

हकीम मजीद ने अपने पारिवारिक व्यवसाय, हमदर्द लैबोरेट्रीज (जिसका अर्थ है “दर्द का साथी”), के तहत रूह अफजा को बाजार में उतारा। शुरुआत में यह स्थानीय स्तर पर बिका, लेकिन इसके स्वाद और औषधीय गुणों ने इसे जल्द ही उत्तर भारत में मशहूर कर दिया।

विभाजन और दो देशों में लोकप्रियता

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन ने हमदर्द के कारोबार को दो हिस्सों में बांट दिया। हकीम मजीद का निधन 1922 में हो चुका था, और उनके परिवार ने व्यवसाय को संभाला। उनके बड़े बेटे, हकीम अब्दुल हमीद, ने भारत में हमदर्द को चलाया, जबकि छोटे बेटे, हकीम मोहम्मद सईद, ने पाकिस्तान में हमदर्द की नींव रखी।

भारत में रूह अफजा रमजान के दौरान इफ्तार का अभिन्न हिस्सा बन गया। उदाहरण के लिए, दिल्ली की जामा मस्जिद और लखनऊ के बाजारों में इफ्तार के समय रूह अफजा के स्टॉल आम थे, जहां लोग इसे दूध या पानी के साथ पीते थे। पाकिस्तान में भी यह कराची और लाहौर जैसे शहरों में हर घर का पसंदीदा बन गया।

“रूह अफजा को ‘मोहब्बत का शरबत’ कहा जाता है, क्योंकि यह हर धर्म और समुदाय के लोगों को जोड़ता है।”

सांस्कृतिक महत्व और बहुमुखी उपयोग

रूह अफजा सिर्फ एक शरबत नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की साझा संस्कृति का प्रतीक है। यह हिंदू, मुस्लिम, सिख, और अन्य समुदायों के बीच उतना ही लोकप्रिय है। रमजान में इफ्तार के लिए इसे विशेष रूप से तैयार किया जाता है। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में इफ्तार की दावतों में रूह अफजा को दूध के साथ मिलाकर परोसा जाता है।

रूह अफजा का उपयोग सिर्फ पीने तक सीमित नहीं है। यह कई पारंपरिक व्यंजनों और मिठाइयों में शामिल होता है। कुछ उदाहरण हैं:

  • फालूदा: दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर फालूदा विक्रेता रूह अफजा का इस्तेमाल इसके रंग और स्वाद को बढ़ाने के लिए करते हैं।
  • शाही टुकड़ा: इस मिठाई में रूह अफजा की चाशनी डालकर इसे और स्वादिष्ट बनाया जाता है, खासकर लखनऊ में।
  • कुल्फी: रूह अफजा को कुल्फी में मिलाकर गुलाबी रंग और गुलाब की सुगंध दी जाती है।
  • मॉकटेल और लेमनेड: मुंबई के कैफे में “रूह अफजा लेमनेड” युवाओं में खूब पसंद किया जाता है।

रूह अफजा सामाजिक समारोहों का भी हिस्सा है। शादी-विवाह, ईद, और दीवाली जैसे अवसरों पर इसे मेहमानों को परोसना आतिथ्य का प्रतीक माना जाता है।

चुनौतियां और अटूट लोकप्रियता

रूह अफजा को समय के साथ कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 20वीं सदी के मध्य में कई स्थानीय ब्रांडों ने इसके जैसा शरबत बनाने की कोशिश की, लेकिन रूह अफजा का मूल स्वाद बेजोड़ रहा। 2019 में रूह अफजा की आपूर्ति में कमी की अफवाहें फैलीं, जिसने इसकी लोकप्रियता को और उजागर किया। सोशल मीडिया पर #RoohAfza ट्रेंड करने लगा।

लोगों ने इसे “राष्ट्रीय आपदा” तक कह डाला, जिससे साबित हुआ कि रूह अफजा सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि लोगों की यादों का हिस्सा है।

आधुनिक युग में रूह अफजा

आज रूह अफजा भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मध्य पूर्व, यूरोप, और उत्तरी अमेरिका में उपलब्ध है। हमदर्द ने समय के साथ नए रूप पेश किए, जैसे:

  • रूह अफजा मिल्कशेक: दूध के साथ तैयार करने के लिए विशेष पैक।
  • रूह अफजा फ्यूजन: आधुनिक स्वाद के लिए नई किस्में।
  • रूह अफजा गो: छोटे, सुविधाजनक पैक।

बाबा रामदेव का ताजा विवाद

अप्रैल 2025 में, रूह अफजा उस समय विवादों में घिर गया जब योग गुरु बाबा रामदेव ने अपने पतंजलि के गुलाब शरबत को प्रमोट करते हुए रूह अफजा पर निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि रूह अफजा जैसा एक शरबत बेचने वाली कंपनी इसके मुनाफे का इस्तेमाल “मदरसों और मस्जिदों” के निर्माण में करती है, जबकि पतंजलि का शरबत “गुरुकुलों और विश्वविद्यालयों” के लिए काम करता है। उन्होंने इसे “शरबत जिहाद” का नाम दिया।

इस बयान से सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई। कई लोगों ने रामदेव के बयान को सांप्रदायिक और भड़काऊ बताया। ट्विटर (अब X) पर #BoycottPatanjali ट्रेंड करने लगा, और लोग रूह अफजा को “मोहब्बत का शरबत” कहकर इसका समर्थन करने लगे। इस विवाद ने रूह अफजा की बिक्री में उछाल ला दिया।

“रूह अफजा का स्वाद और भावनात्मक जुड़ाव इसे हर विवाद से ऊपर रखता है।”

हमदर्द की सामाजिक विरासत

हमदर्द लैबोरेट्रीज ने रूह अफजा की कमाई का बड़ा हिस्सा सामाजिक कार्यों में लगाया। भारत में हमदर्द यूनिवर्सिटी और पाकिस्तान में हमदर्द अस्पताल इसकी मिसाल हैं।

निष्कर्ष

रूह अफजा की कहानी हकीम हाफिज अब्दुल मजीद के एक छोटे से प्रयोग से शुरू होकर एक सांस्कृतिक प्रतीक तक पहुंची। यह शरबत गर्मी की तपिश में ठंडक, रमजान में इफ्तार की रौनक, और उत्सवों में मिठास लाता है। बाबा रामदेव के हालिया विवाद ने इसे फिर से चर्चा में लाया, लेकिन रूह अफजा का स्वाद और भावनात्मक जुड़ाव इसे हर विवाद से ऊपर रखता है। चाहे दिल्ली की गलियां हों, कराची के बाजार, या न्यूयॉर्क के स्टोर, रूह अफजा हर जगह एक ही संदेश देता है—प्यार, एकता, और ताजगी

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Imran Siddiqui

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