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बाबरी मस्जिद की याद में सामूहिक अज़ान और दुआ

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Collective azan and prayer in memory of Babri Masjid

जालना: बाबरी मस्जिद की शहादत की 32वीं बरसी के अवसर पर रज़ा अकादमी, जालना ने शुक्रवार, 6 दिसंबर को एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया. यह कार्यक्रम दोपहर 3:30 बजे केजीएन रोड, दुखी नगर, पुराना जालना में संपन्न हुआ. आयोजन में सामूहिक अज़ान और दुआ के साथ नागरिकों का मार्गदर्शन भी किया गया.

रज़ा अकादमी के मराठवाड़ा अध्यक्ष सैयद जमील मौलाना ने इस अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए बाबरी मस्जिद के ऐतिहासिक महत्व और सामुहीक अजान  के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला. इस समय में मौलाना सैयद जमील रजवी, हाफिज रेहान, हाफिज मुनव्वर, मौलाना अरमान, हाफिज उमर सहित कई गणमान्य नागरिक एवं धार्मिक नेता उपस्थित रहे।

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सामुहीक अजान का उद्देश्य:

सैयद जमील मौलाना ने बताया कि 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद की शहादत के बाद, रज़ा अकादमी ने 1993 से हर वर्ष इस दिन को सामूहिक अज़ान और दुआ के आयोजन के रूप में मनाने का संकल्प लिया. इस आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को ऐतिहासिक घटना से अवगत कराना और मस्जिदों के प्रति उनकी जिम्मेदारियों का अहसास कराना है.

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उन्होंने कहा, “शरीयत के अनुसार, जिस स्थान पर एक बार मस्जिद बन जाती है, वह स्थान हमेशा मस्जिद ही माना जाएगा।

यह आयोजन न केवल अतीत की स्मृतियों को जीवित रखने का प्रयास है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों में ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों के संरक्षण का महत्व समझाने का माध्यम भी है।”

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शांतिपूर्ण आयोजन और सामाजिक संदेश:

रज़ा अकादमी ने इस बात पर जोर दिया कि यह कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया। उन्होंने सभी नागरिकों से इसमें शामिल होने और इसे सफल बनाने की अपील की

धार्मिक जागरूकता का प्रतीक:

यह कार्यक्रम न केवल बाबरी मस्जिद की स्मृति को जीवित रखने का माध्यम है, बल्कि धार्मिक स्थलों की महत्ता को समझने और समुदायिक एकता को मजबूत करने का संदेश भी देता है। रज़ा अकादमी के इस आयोजन में क्षेत्रीय और धार्मिक नेताओं के साथ बड़ी संख्या में नागरिकों ने भाग लिया।

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इस आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरें केवल अतीत की कहानियां नहीं हैं, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और जिम्मेदारी का प्रतीक भी हैं।


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Imran Siddiqui

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