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क़ुरआन का पाठ:ऐ अल्लाह, हमारे इल्म, रोज़ी और अमल में बरकत अता फ़रमा। क़ुरआन पढ़ने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा आमीन!

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क़ुरआन का पाठ
अस्सलामु अलैकुम

ऐ अल्लाह, हमारे इल्म, रोज़ी और अमल में बरकत अता फ़रमा। क़ुरआन पढ़ने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा। आमीन
أَعُوذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
فَجَآءَتۡهُ اِحۡدٰٮہُمَا تَمۡشِىۡ عَلَى اسۡتِحۡيَآءٍ  قَالَتۡ اِنَّ اَبِىۡ يَدۡعُوۡكَ لِيَجۡزِيَكَ اَجۡرَ مَا سَقَيۡتَ لَـنَا‌ ؕ فَلَمَّا جَآءَهٗ وَقَصَّ عَلَيۡهِ الۡقَصَصَ ۙ قَالَ لَا تَخَفۡ‌ ۖ  نَجَوۡتَ مِنَ الۡقَوۡمِ الظّٰلِمِيۡنَ‏ ۞

अनुवाद:
थोड़ी देर बाद उन दोनों औरतों में से एक उनके पास शर्म और हया के साथ चलती हुई आई, कहने लगी: मेरे वालिद आपको बुला रहे हैं, ताकि आपको इस बात का इनाम दें कि आपने हमारी खातिर जानवरों को पानी पिलाया है।  चुनांचे जब वह औरतों के वालिद के पास पहुँचे और उनको सारी दास्ताँ सुनाई, तो उन्होंने कहा: कोई चिंता मत करो, तुम ज़ालिम लोगों से बच आए हो।

तफ़सीर:
: मालूम हुआ कि अगरचे उस वक़्त पर्दे के बाक़ायदा अहकाम नहीं थे जो क़ुरआन करीम ने अता फ़रमाए, लेकिन ख़वातीन शर्म और हया के लिबास में रहती थीं, और मर्दों से मामलात करते वक़्त शर्म और हया को पूरी तरह मल्हूज़ रखती थीं। चुनांचे इब्ने जरीर, इब्ने अबी हातिम और सईद बिन मंसूर ने हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि यह ख़ातून जब आईं तो उन्होंने अपनी क़मीस की आस्तीन अपने चेहरे पर रखी हुई थी।

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: अगरचे किसी नेकी का इनाम वसूल करने के लिए जाना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की गैरत और शराफ़त के ख़िलाफ़ था, लेकिन उन्होंने अल्लाह तआला से दुआ माँगी थी कि आपकी तरफ़ से जो भलाई भी आएगी, मैं उसका मोहताज हूँ, और इस ख़ातून की दावत से एक रास्ता ऐसा पैदा हुआ था कि इस बस्ती में किसी बुज़ुर्ग से जान-पहचान हो जाए और दूसरी तरफ़ उनकी अपनी बेटी को भेजने से उनकी शराफ़त और बुज़ुर्गी ज़ाहिर हो रही थी, इसलिए हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उस वक़्त यह ख़्याल फ़रमाया कि इस दावत को रद्द करना नाशुकरी और उस इबादत के ख़िलाफ़ होगा जिसके साथ दुआ माँगी गई थी, और हो सकता है कि उन बुज़ुर्ग से कोई मुफ़ीद मशवरा मिल जाए।

चुनांचे दावत को क़ुबूल करके उनके पास चले गए, लेकिन इब्ने असाकिर की एक रिवायत में हज़रत अबू हाज़िम से यह तफ़सील मंजूल है कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम वहाँ पहुँचे तो हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने खाना पेश किया, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने कहा: मैं इससे अल्लाह की पनाह माँगता हूँ। हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने पूछा: क्यों? क्या आपको भूख नहीं है? हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया भूख तो है लेकिन मुझे यह अंदेशा है कि यह खाना मेरे इस अमल का मुआवज़ा न बन जाए कि मैंने बकरियों को पानी पिला दिया था, और हम ऐसे लोग हैं कि जो काम आख़िरत की खातिर करें, उसके मुआवज़े में कोई पूरी ज़मीन सोने से भरकर भी दे दे तो उसे क़ुबूल नहीं करते।

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हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया कि: अल्लाह की क़सम, ऐसा नहीं है, लेकिन मेरी और मेरे आबा-ओ-अजदाद की यह आदत रही है कि हम मेहमान की मेहमान-नवाज़ी करते हैं। इस पर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उनके साथ खाना खाने बैठ गए। (रूहुल मआनी, हवाला बाला)। इस रिवायत से यह मालूम होता है कि ख़ातून ने जो कहा था कि मेरे वालिद आपको इसलिए बुला रहे हैं कि आपको आपकी नेकी का इनाम दें, यह उन्होंने अपने ख़्याल के मुताबिक़ कह दिया था, हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने यह अल्फ़ाज़ इस्तेमाल फ़रमाए होंगे। वल्लाह सुब्हानहु अअ़लम।

Quran recitation: O Allah, bless us with knowledge, livelihood and deeds. Give us the ability to read the Quran and act upon it. Amen!


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Imran Siddiqui

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