ImranJalna

Islamic Knowledge, Quran, Hadith and Duas in English, Hindi and Urdu.

हज़रत ख़दीजा (रज़ि.): वो ख़ातून जिन्हें अल्लाह ने सलाम भेजा

Khadija (RA): The Woman Allah Sent Salaam To
कंप्यूटर द्वारा तैयार हिंदी ऑडियो
इस भाषा में पढ़ें: English · हिंदी · اردو

हज़रत ख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद (र.अ.) कौन थीं, और इस्लामी तारीख़ में उनका नाम इतनी ख़ास जगह क्यों रखता है? वो मक्का की एक मुअज़्ज़ज़ ताजिर थीं, नबी करीम ﷺ की पहली बीवी, और वही जो पहली वही (वह्य) की रात आप ﷺ के साथ खड़ी रहीं। सहीह हदीसों में आता है कि जिब्रील (अ.स.) ने उन्हें उनके रब की तरफ़ से सलाम पहुँचाया और जन्नत में एक घर की ख़ुशख़बरी दी। इस लेख में हम उनकी कहानी सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की रिवायतों के सहारे देखेंगे, और जहाँ बातें बाद की सीरत की किताबों से आई हैं वहाँ उसकी निशानदेही भी करेंगे।

Story of Hazrat Khadija (RA), Umm al-Mu'minin, from the Ruhani Dua series on the women companions

पूरी वीडियो देखें: अल्लाह ने ख़ुद जिन्हें सलाम भेजा | हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) की पूरी कहानी | Hazrat Khadija RA Story — रूहानी दुआ यूट्यूब चैनल पर।

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के बारे में चंद बातें

पूरा नामख़दीजा बिन्त ख़ुवैलिद (र.अ.)
क़बीलाक़ुरैश, मक्का
लक़बउम्मुल मोमिनीन (मोमिनों की माँ); एक कामयाब ताजिर
नबी ﷺ से निकाहबहुत सी रिवायतों के मुताबिक़ तक़रीबन 595 ई.; निकाह के वक़्त उनकी उम्र के बारे में मुअर्रिख़ीन के बयान अलग-अलग हैं
वफ़ाततक़रीबन 619 ई., नुबुव्वत का दसवाँ साल, जिसे आमुल हुज़्न (ग़म का साल) कहा जाता है
नबी ﷺ से औलादसीरत की रिवायत के मुताबिक़ ज़ैनब, रुक़ैया, उम्मे कुलसूम, फ़ातिमा (र.अ.) और वो बेटे जो बचपन में ही इंतिक़ाल कर गए

मक्का की एक कामयाब ताजिर

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) क़ुरैश के एक मुअज़्ज़ज़ घराने में पैदा हुईं। सीरत की रिवायतों के मुताबिक़ वो एक क़ाबिल ताजिर थीं और अपनी तरफ़ से तिजारत करने के लिए भरोसेमंद लोगों को रखती थीं। नबी ﷺ मक्का में अपनी सच्चाई और अमानतदारी के लिए जाने जाते थे, और रिवायत है कि उन्होंने आप ﷺ को अपना माल देकर तिजारती सफ़र पर भेजा, जिसमें उनका ग़ुलाम मैसरा साथ था। कुछ बातों में मुअर्रिख़ीन का इख़्तिलाफ़ है, जैसे उनकी सही उम्र और पहले कितने निकाह हुए थे, इसलिए इन तफ़सीलात को ज़्यादा पकड़ने के बजाय उस बात पर ठहरना बेहतर है जिस पर सब मुत्तफ़िक़ हैं: वो एक शरीफ़, मालदार और क़ाबिले-एहतराम ख़ातून थीं।

निकाह

बहुत सी रिवायतों के मुताबिक़ हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने एक भरोसेमंद सहेली के ज़रिए पैग़ाम भिजवाया कि क्या नबी ﷺ निकाह पर राज़ी होंगे, और दोनों घरानों ने रज़ामंदी दे दी। मुअर्रिख़ीन आम तौर पर यह निकाह तक़रीबन 595 ई. में बताते हैं, जब नबी ﷺ अपनी जवानी के बीच के बरसों में थे। वो ज़िंदगी भर आप ﷺ की इकलौती बीवी रहीं, और यह रिफ़ाक़त तक़रीबन पच्चीस बरस की रही।

पहली वही की रात

उनकी कहानी का सबसे अहम मौक़ा सहीह बुख़ारी में दर्ज है। हज़रत आइशा (र.अ.) ने बयान किया कि वही शुरू होने से पहले नबी ﷺ ग़ार-ए-हिरा में इबादत के लिए तन्हाई इख़्तियार करते और खाने-पीने का सामान लेने हज़रत ख़दीजा (र.अ.) के पास लौटते। फिर एक दिन ग़ार में अचानक हक़ आ गया। आप ﷺ घर लौटे तो काँप रहे थे और हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से फ़रमाया कि मुझे चादर उढ़ा दो। जब घबराहट दूर हुई तो आप ﷺ ने सारा वाक़िया उन्हें सुनाया और फ़रमाया कि मुझे अपनी जान का ख़ौफ़ है।

उनका जवाब सीरत के सबसे ज़्यादा दोहराए जाने वाले अल्फ़ाज़ में से है। उन्होंने तसल्ली दी कि अल्लाह आपको कभी रुसवा नहीं करेगा, और फिर आप ﷺ के किरदार की गवाही दी: आप रिश्तेदारों से अच्छा सुलूक करते हैं, ग़रीबों और मुहताजों की मदद करते हैं, मेहमानों की ख़ातिर करते हैं, और मुसीबतज़दा लोगों का साथ देते हैं (सहीह बुख़ारी 3)। फिर वो आप ﷺ को अपने चचाज़ाद भाई वरक़ा बिन नौफ़ल के पास ले गईं, जैसा कि उसी हदीस में आता है।

हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने कहा: “हरगिज़ नहीं! अल्लाह की क़सम, अल्लाह आपको कभी रुसवा नहीं करेगा।” (सहीह बुख़ारी 3)

ग़ौर कीजिए कि उन्होंने अपनी तसल्ली की बुनियाद किस पर रखी: आप ﷺ के जाने-पहचाने किरदार पर। उनका यक़ीन बरसों आप ﷺ के साथ रहकर आपकी सच्चाई और नेकी देखने से पैदा हुआ था।

रब की तरफ़ से सलाम

हज़रत अबू हुरैरा (र.अ.) ने सहीह बुख़ारी में बयान किया कि जिब्रील (अ.स.) नबी ﷺ के पास आए और कहा कि ख़दीजा (र.अ.) खाने या पीने का एक बर्तन लेकर आ रही हैं। जब वो पहुँचें तो उन्हें उनके रब की तरफ़ से सलाम पहुँचा दीजिए, और उन्हें जन्नत में एक ऐसे घर की ख़ुशख़बरी दीजिए जिसमें न शोर होगा न मशक़्क़त (सहीह बुख़ारी 3820; सहीह मुस्लिम 2432 में भी)। घर के बारे में अल्फ़ाज़ अलग-अलग रिवायतों में मुख़्तलिफ़ हैं: किसी में क़सब (मोती वग़ैरह) का ज़िक्र है, किसी में खोखले मोती का।

एक रिवायत में आता है कि जब सलाम पहुँचाया गया तो उन्होंने जवाब दिया कि अल्लाह ख़ुद अस-सलाम है, और जिब्रील पर और अल्लाह के रसूल ﷺ पर सलामती भेजी। उलमा बताते हैं कि उन्होंने अल्लाह के लिए “उन पर सलाम हो” नहीं कहा क्योंकि वो ख़ुद सलामती का सरचश्मा है। यह वो एहतराम है जिसे रिवायतें ख़ास तौर पर उन्हीं से जोड़ती हैं।

दुनिया की औरतों में उनका मक़ाम

हज़रत अली (र.अ.) ने बयान किया कि नबी ﷺ ने फ़रमाया: अपने ज़माने की औरतों में सबसे बेहतर मरयम थीं और अपने ज़माने की औरतों में सबसे बेहतर ख़दीजा हैं (सहीह बुख़ारी 3815; सहीह मुस्लिम में भी)। सहीह बुख़ारी में इस हदीस का बाब नबी ﷺ के हज़रत ख़दीजा (र.अ.) से निकाह और उनकी फ़ज़ीलत के बारे में है।

आज़माइश के बरस और आमुल हुज़्न

वही के बाद मक्का के बरस शुरुआती मुसलमानों के लिए बहुत कठिन थे। सीरत की रिवायत के मुताबिक़ नबी ﷺ के ख़ानदान और साथियों का समाजी और मआशी बाइकॉट किया गया और उन्हें शिअब अबी तालिब नाम की घाटी में महसूर रहना पड़ा। मुअर्रिख़ीन बताते हैं कि इस तंगी का असर हज़रत ख़दीजा (र.अ.) की सेहत पर पड़ा। उनकी वफ़ात तक़रीबन 619 ई. में हुई, और उनकी और अबू तालिब की वफ़ात की वजह से वो साल आमुल हुज़्न यानी ग़म का साल कहलाया। रिवायत है कि उस वक़्त नबी ﷺ की उम्र तक़रीबन 49 बरस थी। उनकी वफ़ात के वक़्त की उम्र के बारे में 52 और 65 जैसे आँकड़े बयान होते हैं, इसलिए हम इसे ग़ैर-यक़ीनी छोड़ते हैं।

Stay connectedFollow Namaz Timings & Islamic Updates on WhatsApp for daily Namaz times, Islamic dates and Muslim-world news.
Follow on WhatsApp

नबी ﷺ उन्हें ज़िंदगी भर मुहब्बत से याद करते रहे। हज़रत आइशा (र.अ.) ने बयान किया कि उन्हें किसी बीवी पर इतनी ग़ैरत नहीं आई जितनी ख़दीजा (र.अ.) पर आई, क्योंकि नबी ﷺ उनका ज़िक्र बहुत कसरत से किया करते थे (सहीह बुख़ारी)।

रिज़्क़ और परवरिश पर क़ुरआनी ग़ौर-ओ-फ़िक्र

क़ुरआन नबी ﷺ को उन बरसों में अल्लाह की परवरिश याद दिलाता है। सूरह अज़-ज़ुहा की आयत 8 में फ़रमाया गया कि अल्लाह ने आपको तंगदस्त पाया और ग़नी कर दिया। कुछ उलमा और अहले-क़लम इस परवरिश को उस सहारे से जोड़ते हैं जो आप ﷺ को ज़िंदगी में मिला, जिसमें निकाह के ज़रिए मिला सहारा भी शामिल है, लेकिन आयत ख़ुद किसी का नाम नहीं लेती, इसलिए हम इसे सिर्फ़ अल्लाह के रिज़्क़ पर एक ग़ौर-ओ-फ़िक्र के तौर पर ज़िक्र करते हैं।

وَوَجَدَكَ عَآئِلًا فَأَغْنَىٰ

“और उसने आपको तंगदस्त पाया तो ग़नी कर दिया।” (सूरह अज़-ज़ुहा 93:8)

आज के लिए सबक़

  • हालात से ज़्यादा किरदार पर भरोसा। हज़रत ख़दीजा (र.अ.) ने नबी ﷺ को आगे का अंदाज़ा लगाकर नहीं, बल्कि आपकी नेकियाँ याद दिलाकर तसल्ली दी।
  • साथ देना भी इबादत है। सबसे कठिन घड़ी में उनकी साबित-क़दमी बताती है कि एक पुरसुकून, ईमान वाला साथ कितना क़ीमती होता है।
  • दौलत और सलाहियत को भलाई में लगाइए। वो एक कामयाब ताजिर थीं, और रिवायतें उन्हें उनकी सख़ावत के साथ याद करती हैं।
  • छोटी-छोटी मुहब्बत भरी बातें अल्लाह के यहाँ याद रखी जाती हैं। हदीस में है कि उन्हें उस वक़्त सलाम भेजा गया जब वो नबी ﷺ के लिए खाना ला रही थीं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवालात

क्या हज़रत ख़दीजा (र.अ.) सबसे पहले इस्लाम लाने वाली थीं?

सीरत की बहुत सी रिवायतें कहती हैं कि वो नबी ﷺ पर सबसे पहले ईमान लाने वालों में थीं। सहीह बुख़ारी 3 की हदीस में उनकी फ़ौरन तसल्ली से उनके शुरुआती और मज़बूत भरोसे का पता चलता है। चूँकि सबसे पहले ईमान लाने वालों की तरतीब पर सीरत की किताबों में बहस मिलती है, इसलिए सबसे महफ़ूज़ बात यह है कि वो सबसे पहले ईमान लाने वालों में थीं और आम तौर पर पहली ही मानी जाती हैं।

क्या वाक़ई अल्लाह ने हज़रत ख़दीजा (र.अ.) को सलाम भेजा?

जी हाँ, यह सहीह बुख़ारी 3820 और सहीह मुस्लिम 2432 में मरवी है: जिब्रील (अ.स.) ने नबी ﷺ से कहा कि उन्हें उनके रब की तरफ़ से सलाम पहुँचाइए और जन्नत में एक घर की ख़ुशख़बरी दीजिए।

इसे आमुल हुज़्न (ग़म का साल) क्यों कहते हैं?

यह इस्लामी रिवायत में नुबुव्वत के दसवें साल, तक़रीबन 619 ई., का नाम है, जिसमें हज़रत ख़दीजा (र.अ.) और नबी ﷺ के चचा और हामी अबू तालिब दोनों का इंतिक़ाल हुआ। अबू तालिब के क़बीले की हिमायत छिन जाने से मक्का में नबी ﷺ के लिए ज़िंदगी और मुश्किल हो गई।

और पढ़ें:

हवाले: सहीह बुख़ारी 3; सहीह बुख़ारी 3815; सहीह बुख़ारी 3820 और सहीह मुस्लिम 2432 (देखें sunnah.com सर्च: Khadija); क़ुरआन 93:7-11 (quran.com)।

यह खबर पढ़ें: English | اردو


Discover more from ImranJalna

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

author avatar
Imran Siddiqui
Imran Siddiqui is a senior journalist and editor of NewsNationOnline, with over 17 years of experience covering news, politics, education and social issues in Maharashtra.

Leave a Reply