Advertisement

फिलिस्तीन का सम्पूर्ण इतिहास.

28a2fb188bb0efbadd2cc4fcf51882fe7986936963744079994


यरोशलम में मौजूद मस्जिद ए अक्सा इस्लाम की तीसरी सबसे महत्वपूर्ण मस्जिद है, ये मस्जिद जिस प्राचीन परिसर में बनी है उस परिसर को हिब्रू में ‘बैतल मकदिश’ और अरबी में “बैतुल मुक़द्दस” (यानी ख़ुदा का पवित्र घर) कहा जाता है, ये माना जाता है कि यहां हज़रत सुलेमान की बनाई हुई इबादतगाह हुआ करती थी, जिसकी अब केवल एक दीवार बची है….

…. बुखारी शरीफ मे नबी करीम सल्ल. की एक हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्सा मे एक नमाज़ पढ़ने पर 500 नमाज़ें पढ़ने जितना पुण्य मिलता है ( पहले नम्बर पर काबा शरीफ़ को बताया गया जहाँ एक नमाज़ पढ़ने का सवाब 1,00,000 नमाज़ों जितना, फिर मदीना शरीफ़ स्थित मस्जिद ए नबवी, जहाँ एक नमाज़ का पुण्य 1000 नमाज़ों जितना, और तीसरे नम्बर पर मस्जिद ए अक्सा है )
ये माना जाता है कि काबा शरीफ को किबला बनाए जाने से पहले मुस्लिम कुछ समय तक मस्जिद ए अक्सा की ओर मुंह कर के नमाज़ पढ़ते थे.


एक और हदीस के अनुसार मस्जिद ए अक्सा दुनिया मे बनाई गई इस्लाम की दूसरी मस्जिद है, और इसे इस्लाम की पहली मस्जिद यानि काबा शरीफ़ के बनाए जाने के मात्र 40 वर्ष बाद बनाया गया था .फिर इसरा और मेराज की बहुचर्चित घटना मे अल्लाह ने एक ही रात मे नबी सल्ल. को काबा शरीफ़ से बैतुल मुकद्दस की यात्रा कराई थी, इन कारणों से ये मस्जिद मुस्लिमों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है.

यहूदी और ईसाई धर्म ग्रंथों के अनुसार हजरत इब्राहीम अ.स. के बाद कई नबियों ने इस मस्जिद को अपनी इबादतगाह बनाया किन्तु हजरत सुलेमान अ.स. के ज़माने तक यह मस्जिद नष्ट हो चुकी थी और यहूदी धर्म मे कई कुरीतियां बन गईं थीं, हजरत सुलेमान (सोलोमन) ने बैतुल मुकद्दस का पुनर्निर्माण कराया और यहूदी धर्म की कुरीतियों को मिटाया, इसके बाद यहाँ यहूदी साम्राज्य बहुत फला फूलाकिन्तु सन् 70 ईस्वी मे रोमनों ने बैतुल मुकद्दस को जलाकर नष्ट कर दिया, और इसे रोमन देवताओं (ज्यूपिटर आदि .) के मन्दिर मे तब्दील कर दिया.

फिर जब 315 ईस्वी मे रोमन शासक कॉन्सटेण्टाइन ( Constantine ) अपना धर्म परिवर्तन कर के ईसाई बन गया, तो फिर रोमनों ने उस बैतुल मुकद्दस को त्याग दिया जिसे उन्होंने मूर्ति स्थल बना दिया था , और धीरे धीरे इस जगह को यरूशलम के लोगों ने जिनमे यहूदी भी शामिल थे कूडा डालने की जगह बना दिया, उन यहूदियों ने भी बैतुल मुकद्दस को पवित्र स्मारक मानना छोड़ दिया था .614 ईस्वी मे रोमनों को पारसियों ने पराजित कर दिया, अब यहूदी बिल्कुल आज़ाद थे अपनी मनचाही जगह पर इबादत करने को, पर तब भी यहूदियों ने बैतुल मुकद्दस को इबादत करने के लिए नहीं चुना, हां यरूशलम मे ये भी होता रहा कि अलग अलग साम्राज्यों मे कभी ईसाईयों द्वारा यहूदियों को सताया गया तो कभी यहूदियों द्वारा ईसाईयों को , दोनों ही धर्मों के लोग शांति से जीने के लिए यरोशलम मे उस न्यायप्रिय शासक के आने का इन्तज़ार कर रहे थे जिसकी भविष्यवाणी उनके धर्मग्रंथों मे की गई थी
.
उनका ये इन्तज़ार सातवीं शताब्दी मे अरब मे हजरत मोहम्मद सल्ल. के आगमन के उपरांत पूरा हुआ और इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर इब्ने ख़त्ताब रज़ि. के ज़माने मे यरूशलम मे इस्लाम आया, हजरत उमर ने मस्जिद ए अक्सा को एक बार फिर तामीर करवाया .
यरूशलम मे मुस्लिमों और एक न्यायप्रिय मुस्लिम शासक के आने से ईसाई और यहूदियों दोनों समुदायों ने बड़ी राहत महसूस की,

614 ईस्वी मे रोमनों को पारसियों ने पराजित कर दिया, अब यहूदी बिल्कुल आज़ाद थे अपनी मनचाही जगह पर इबादत करने को, पर तब भी यहूदियों ने बैतुल मुकद्दस को इबादत करने के लिए नहीं चुना, हां यरूशलम मे ये भी होता रहा कि अलग अलग साम्राज्यों मे कभी ईसाईयों द्वारा यहूदियों को सताया गया तो कभी यहूदियों द्वारा ईसाईयों को , दोनों ही धर्मों के लोग शांति से जीने के लिए यरोशलम मे उस न्यायप्रिय शासक के आने का इन्तज़ार कर रहे थे जिसकी भविष्यवाणी उनके धर्मग्रंथों मे की गई थी.

उनका ये इन्तज़ार सातवीं शताब्दी मे अरब मे हजरत मोहम्मद सल्ल. के आगमन के उपरांत पूरा हुआ और इस्लाम के दूसरे खलीफा हजरत उमर इब्ने ख़त्ताब रज़ि. के ज़माने मे यरूशलम मे इस्लाम आया, हजरत उमर ने मस्जिद ए अक्सा को एक बार फिर तामीर करवाया .

यरूशलम मे मुस्लिमों और एक न्यायप्रिय मुस्लिम शासक के आने से ईसाई और यहूदियों दोनों समुदायों ने बड़ी राहत महसूस की. ग्यारहवीं शताब्दी मे फिलिस्तीन पर यूरोपीय ईसाईयों ने हमला किया, उन्होंने यहूदियों और मुस्लिमों पर बड़े अत्याचार किए, उन यूरोपीय ईसाईयों ने यहूदियों को मार कर उनके मन्दिरों मे डाल दिया और मुस्लिमों को मारकर मस्जिद ए अक्सा में फेंक दिया. बल्कि इन यूरोपीय ईसाईयों ने अरबी ईसाईयों को भी सताने से परहेज़ नही किया , फिलीस्तीन के यहूदी अपनी जान बचाकर स्पेन भाग गए ताकि स्पेन के मुस्लिम शासन का संरक्षण उन्हें मिल जाए .

सन् 1189 ईस्वी मे इस्लामी फौज के सरदार, हज़रत सलाहुद्दीन अयूबी ने यरूशलम से जालिम यूरोपीय ईसाईयों को निकाल बाहर किया , और यरूशलम मे वापस इस्लामी कानून लागू किया .

इस इस्लामी शासन मे ईसाई, यहूदी और मुस्लिम सभी बड़ी शांति और मेल मोहब्बत से रहते थे…. सौहार्द की ये स्थिति 19 वीं सदी तक कायम रही जब तक फिलीस्तीन मुस्लिम आटोमन साम्राज्य के अधीन था

1896 में आई थियोडोर हर्ल्ज़ की क़िताब द जेविश स्टेट , जिसमें यहूदी राज्य के गठन की कल्पना की गई थी। हर्ल्ज़ एक यहूदी पत्रकार और लेखक था और वो चाहता था कि यहूदी का अपना राष्ट्र हो… लेकिन जेविश स्टेट की योजना इस किताब से पहले ही रसूखदार यहूदियों के दिमाग मे पल रही थी, यूरोप से दूर अरब के फिलिस्तीन में यहूदियों को ले जाकर बसाने पर यहूदी और यूरोपीय ईसाइयों में गुपचुप समझौता बन गया था.

इसीलिए 1897 के पहले ही कुछ यहूदी इस इलाक़े में पहुँचना शुरू हो गए थे. 1903 तक वहाँ 25,000 यहूदी इकट्ठा हो गए थे जिनमें से ज़्यादातर पूर्वी यूरोप से आए थे. उस समय वह इलाक़ा आटोमन साम्राज्य का हिस्सा था और क़रीब पाँच लाख अरबों के साथ यहूदी भी रहने लगे. 1904 और 1914 के बीच और 40 हज़ार अप्रवासी वहाँ पहुँच गए. 1917 पहले विश्व युद्ध के दौरान इस इलाक़े पर तुर्की के आटोमन साम्राज्य का शासन था. इस इलाक़े से तुर्की का नियंत्रण उस समय ख़त्म हुआ जब ब्रिटेन ने आटोमन साम्राज्य को ख़त्म कर दिया.

अब फिलीस्तीन पर अंग्रेज़ी शासन हो गया और यहूदी यहां यूरोप से आ आकर बसते रहे, जर्मनी में हिटलर के यातना शिविरों से बचकर भागे यहूदियों ने भी इसी फिलिस्तीन में शरण ली,

…. फिर जब 15 मई 1948 को ब्रिटेन ने फिलीस्तीन को स्वतंत्र कर देने की घोषणा की तो उसी दिन अनेक सशस्त्र यहूदी आतंकवादियों ने असंख्य निर्दोष फलिस्तीनियों की हत्या कर के यरूशलम पर और फिलिस्तीन के अनेक हिस्सों पर कब्ज़ा कर के ,इस लूटे हुए क्षेत्र को इजरायल नाम दिया

….. यूनाइटेड नेशंस ने यहूदियों के क़ब्ज़े वाले क्षेत्र को एक नए देश के रूप में मान्यता दे दी, लेकिन तब यरोशलम यहूदियों के कब्जे में नही था,
ज़ाहिर है, फिलिस्तीनियों को यहूदियों का क़ब्ज़ा मंजूर नही था, वो इज़राइल के विरुद्ध संघर्ष करते रहे, और इसे बहाना बनाकर अमेरिका और यूरोप के भेजे हथियारों के बल पर इज़राइल फिलिस्तीन की जमीनों पर कब्ज़े करता रहा.

इज़रायल ने पूरा यरूशलम अवैध रूप से कब्ज़ा कर रखा है, और फिलीस्तीनी मुस्लिमों को जेलों में डालना, फिलिस्तीन की महिलाओं, लड़कों, छोटे छोटे बच्चों तक की हत्याएं कर डालने जैसे अपराध इज़राइल दशकों से करता आ रहा है, और दुनियाभर के तथाकथित मानवतावादी मुँह मे दही जमा कर बैठे रहते हैं….

दुनिया के दोगलेपन और इस्लामोफोबिया की जीती जागती सूरत देखनी हो तो फिलिस्तीन-इज़रायल मुद्दे पर तथाकथित मानवता वादियों के विचार सुन लीजिये, … सारी हकीकत सामने आ जायेगी !!


Discover more from Nayi Soch News-e-Hub

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

author avatar
Imran Siddiqui

Discover more from Nayi Soch News-e-Hub

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading