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जानिए हज़रत इमाम हुसैन की पूरी कहानी (Hazrat Imam Hussain Story in Hindi)

हज़रत इमाम हुसैन को इस्लाम में शहीद का दर्जा दिया गया हैं। उनकी शहादत की कहानी हर किसी को रुला सकती है। इमाम हुसैन की याद में ही मुहर्रम के महीने में उनकी शहादत को याद किया जाता हैं। हज़रत इमाम हुसैन मानवता प्यार और अहिंसा के प्रतिक थे। उनके कर्बला में शहीद होने की किस्से कई हदीसों में आये हैं। आज के इस आर्टिकल में हम हज़रत इमाम हुसैन के बारे में तफ्सील से जानेंगे। उनके जन्म, उनकी कहानी और कर्बला के किस्से को बताने की कोशिश करेंगे। 
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हज़रत इमाम हुसैन का जन्म कहाँ हुआ था?

हज़रत इमाम हुसैन पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नवासे और अली इब्ने अबी तालिब (हजरत अली) और हज़रत फातिमा के बेटे थे। हज़रत इमाम हुसैन का जन्म इस्लामिक कलैंडर के हिसाब से 3 शाबान, सन 4 हिजरी और अंग्रेजी के हिसाब से 8 जनवरी 626 ईस्वी में मदीना में हुआ था। हज़रत फातिमा आप पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद की बेटी थी। इस हिसाब से हज़रत इमाम हुसैन पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के नवासे थे।

हज़रत इमाम हुसैन की कितनी औलादें थी?

हज़रत इमाम हुसैन की कुल 6 औलादें थी जिनके नाम कुछ इस प्रकार है, 

  1. इमाम ज़ैनुल आबेदीन 
  2. अली अल-अकबर इब्न अल हुसैन’
  3. अली अल-असगर इब्न अल हुसैन 
  4. इमाम जाफर 
  5. फातिमा सुगरा बिन्त हुसैन 
  6. सकीना बिन्त अल हुसैन 

हज़रत इमाम हुसैन की कहानी 

हज़रत अली की की हत्या के बाद मुआविया ने शासन किया गद्दी पर बैठा, यानि इलाके का खलीफा नियुक्त हुआ। उस वक़्त हज़रत अली के बेटे हसन और हुसैन ने अपने पिता की हत्या के बाद मुआविया के शासन को स्वीकार लिया था लेकिन मुआविया की मौत के बाद उसका बेटा यज़ीद सत्ता हासिल करना चाहता था। जो की बहुत क्रूर और अत्याचारी शासक था। मुआविया की मौत के बाद इलाके के लोग हज़रत इमाम हुसैन को खलीफा बनाना चाहते थे लेकिन यज़ीद ने लोगों में दहशत फैलाकर और पैसा देकर इलाके पर कब्ज़ा कर लिया था। यज़ीद एक बहुत चालाक शख्स था। उसने सत्ता हासिल करने के लिए डर और दहशत वाला बहुत गलत रास्ता चुना। इलाके के सारे लोग हज़रत इमाम हुसैन को खलीफा बनाने के पक्ष में थे लेकिन यज़ीद के डर से चुप रहते थे जबकि खलीफा बनने का हक़ सिर्फ हज़रत इमाम हुसैन को था। यज़ीद को हर वक़्त इसी बात का डर रहता था की कहीं हज़रत इमाम हुसैन सत्ता हासिल न कर ले इसलिए वह लोगों को भी डराता रहता था ताकि लोग उसके डर के वजह से हज़रत इमाम हुसैन के समर्थन में न जाये। सारे लोग यज़ीद से डरते थे लेकिन हज़रत इमाम हुसैन उससे बिलकुल बेखौफ थे। हज़रत इमाम हुसैन इन्साफ पसंद इंसान थे। वह सही तरीके से यज़ीद को सत्ता से हटाना चाहते थे ताकि लोगो पर यज़ीद का ज़ुल्म ख़त्म हो जाये और इलाके के लोग बेखौफ और प्यार से रहे।

उस वक़्त यज़ीद का शासन था। यज़ीद एक बहुत अत्याचारी आदमी था वह वहां के लोगों को डरा कर उनपर अत्याचार करके इलाके पर राज करता था। उसका एक की मकसद था की लोगो पर ज़ुल्म करके उन्हें डरा धमका कर इलाके पर कब्ज़ा किया जाये ताकि लोग उसके डर से उसकी इज़्ज़त करें और पुरे इलाके में उसका खौफ रहे। 

हज़रत इमाम हुसैन का किरदार

हज़रत इमाम हुसैन बहुत बड़े इबादत गुज़ार थे। वह रात भर अल्लाह की इबादत में लगे रहते थे। दिन में वह इलाके में रह रहे ग़रीबो की मदद करते थे।  उनके हमदर्द बनते थे उनकी खुशियों में शरीक होते थे और खुशियां बाँटते थे। बाकि वक़्त वह इस्लाम के प्रचार में निकालते थे। उनका एक ही मकसद था की लोगों की भलाई की जाये और इस्लाम को पूरी धरती पर फैलाया जाये। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदग इस्लाम के प्रचार प्रसार में गुज़र की। पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने दोनों नवासे हसन और हुसैन के बारे में कहते थे की मेरे लिए हसन और हुसैन दुनिया की सबसे अच्छी खुशबु हैं।

हज़रत इमाम हुसैन को लोगों और समाज से प्यार था। वह यज़ीद की डर की राजनीति को पसंद नहीं करते थे। लोग भी आप इमाम हुसैन के समर्थन में थे।यज़ीद को जब इस बात का अहसास हुआ की लोग आपके समर्थन में है। उसने सोचा की अगर हज़रत इमाम हुसैन भी उसका समर्थन करेंगे तो लोग भी उसका यानि यज़ीद का समर्थन करेंगे लेकिन हज़रत इमाम हुसैन ने यज़ीद की हर बात मानने से इंकार कर दिया था। यज़ीद ने फिर यह योजना बनायीं की जो उसकी बात नहीं मानेगा या उसके खिलाफ जायेगा वह उसे जान से मार देगा। हज़रत इमाम हुसैन को भी वह मरना चाहता था इस बात का अंदाज़ा आप हज़रत इमाम हुसैन को हो गया था। 

हज़रत इमाम हुसैन ने मदीना क्यों छोड़ा?

जब हज़रत इमाम हुसैन को मालूम चला की यज़ीद उनको मरना चाहता हैं तो उन्होंने अपने परिवार की हिफाज़त के लिए मदीना छोड़ने का फैसला किया और मक्का जाने का फैसला किया। जब आप मदीना से मक्का के लिए जाने का सोच रहे थे तब हज का महीना भी चल रहा था यानि काफी लोग उस वक़्त पवित्र शहर मक्का में हज के लिए जा रहे थे। आपने भी फैसला किया की आप भी हज के लिए जायेंगे। बस यही सोच कर आप मदीना से मक्का के लिए निकल गए। जब आप मक्का पहुंचे तो उनको कूफ़ा जो की उस वक़्त इराक का एक शहर था वहां से काफी लोगों का समर्थन मिला। आपको किसी ने खबर दी की कूफ़ा के लोग आपके समर्थन में हैं और यज़ीद के ज़ुल्म को ख़त्म करने के लिए तैयार हैं और आप के साथ हैं।आपको इस बात को सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई की कूफ़ा में उनके काफी समर्थक हैं। उन्होंने फिर मक्का से कूफ़ा जाने के लिए फैसला किया क्यूंकि वो यज़ीद के ज़ुल्म को ख़त्म करना चाहते थे। मक्का के कई लोगों ने आपको समझाया की आप कूफ़ा न जाये वहां आपकी और आपके परिवार की जान को खतरा हो सकता हैं लेकिन आप ने बड़ी सूझ बुझ से फैसला किया की वह कूफ़ा जायेंगे और लोगों से मिलेंगे और यज़ीद के आतंक को खत्म करेंगे। यज़ीद को इस बात का पता चल गया था की कूफ़ा के लोग आप हज़रत इमाम हुसैन के साथ हैं और उसके खिलाफ जुंग के लिए तैयार हैं। ये सुनकर यज़ीद बहुत डर गया था। उसे ये डर हो गया था की अगर सारे लोग हज़रत इमाम हुसैन के साथ हो गए तो उसकी सत्ता जा सकती हैं।

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हज़रत इमाम हुसैन कर्बला कैसे पहुँचे?

जब आप कूफ़ा के लिए मक्का से रवाना हुए तो यज़ीद ने अपनी सेना जिनकी तादाद हज़ारों में थी आपके पीछे लगा दी। इतनी भारी संख्या के आने का अंदाज़ा जब कूफ़ा के लोगों को लगा तो बहुत से लोग डर गए और उन्होंने हज़रत इमाम हुसैन का समर्थन करने से मना कर दिया। कुछ लोग ऐसे भी थे जो यज़ीद की सेना से लड़ने के लिए तैयार थे लेकिन ऐसे लोग बहुत कम थे ज़्यादातर लोगों ने यज़ीद की ताकत और उसकी सेना के डर से आखरी वक़्त में इमाम हुसैन का साथ देने से इंकार दिया था। जब इस बात का पता हज़रत इमाम हुसैन को लगा तो उनको लग गया था की यज़ीद अब उन्हें नहीं छोड़ेगा और उनकी मौत निश्चित हैं लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने फिर भी कूफ़ा की और बढ़ने की यात्रा जारी रखी। अब उनके साथ उनके परिवार के कुछ लोग और साथ में उनके कुछ समर्थक थे। 

यज़ीद की सेना आपको कूफ़ा नहीं जाने देना चाहती थी इसलिए उन्होंने कूफ़ा के रास्ते पर अपनी सेना लगा दी और इमाम हुसैन के काफिले को कूफ़ा की जगह कर्बला की और जाने के लिए मजबूर किया। कर्बला जो की उस वक़्त की एक बीहड़ जगह और गरम रेगिस्तान था। जहाँ सिवाय बंजर ज़मीन के कुछ नहीं था। इमाम हुसैन और उनका काफिला जिसमे कुल 72 लोग थे जब मुहर्रम की 2 तारीख  61 हिजरी को कर्बला पहुंचे तब यज़ीद की सेना भी वहां पहुँच गयी। मुहर्रम की 7 तारीख  को यज़ीद की सेना ने कर्बला में मौजूद एक नहर फ़ुरात नदी(अलक़मा नहर) पर पहरा लगा दिया ताकि हज़रत इमाम हुसैन और उनका काफिला पानी नहीं पी सके और अगर पानी पीने आये तो उन्हें उसी वक़्त मार दिया जाये। हज़रत इमाम हुसैन फिर भी यज़ीद की सेना के सामने झुकने को तैयार नहीं थे वह बिना पानी के अपना सफर करते रहे। कर्बला के रेगिस्तान की इतनी गर्मी में बिना पानी के रहना बहुत मुश्किल था। बिना पानी के हज़रत इमाम हुसैन के बच्चे प्यास से तड़पने लगे क्यूंकि उनके पास न पानी बचा था न खाना। बिना पानी और भूक के रहते हुए उन्हें 2 दिन हो गए थे। 

इमाम हुसैन कर्बला में यज़ीद से लड़ना नहीं चाहते थे वह बस अपने परिवार को वहां से निकालना चाहते थे ताकि वह किसी तरह कूफ़ा तक पहुंच जाये। उनको पता था की यज़ीद की सेना उनके पुरे परिवार को मार देगी इसलिए वह सेना की सामने नहीं आना चाह रहे थे। मुहर्रम की 9 तारीख को यज़ीद की सेना ने कर्बला में आप के काफिले पर हमला कर दिया। अब आप समझ गए थे की उनका बचना मुश्किल हैं। हज़रत इमाम हुसैन ने यज़ीद की सेना से एक रात की मोहलत मांगी ताकि आप मुहर्रम की 9 तारीख की रात अल्लाह की इबादत कर सके और अल्लाह से अगले दिन जंग में फ़तेह हासिल करने की दुआ मांग सके। यज़ीद की सेना उनकी इस बात को मान गयी और उन्हें यानि हज़रत इमाम हुसैन को एक रात की मोहलत दे दी क्यूंकि यज़ीद की सेना को मालूम था की ये लोग बिना पानी खाने के रह रहे हैं और एक रात में तो ये और कमज़ोर हो जायेंगे। 

कर्बला की जंग का वाक़ेया 

एक रात की मोहलत मिलने के बाद हज़रत इमाम हुसैन उनके परिवार और काफिले ने रात भर अल्लाह की इबादत की और जंग में फ़तेह हासिल करने की दुआ मांगी।  अगले दिन यानि मुहर्रम की 10 तारीख को जंग का ऐलान दोनों और से हुआ।  जंग में हज़रत इमाम हुसैन के समेत कुल 72 योद्धा यज़ीद की हज़ारों सेना के सामने युद्ध करने को तैयार थे। प्यास और भूक की हालत में भी आपके लोगों ने यज़ीद की हर बात को मानने से इंकार दिया क्यूंकि वह यज़ीद के सामने झुकने से ज़्यादा शहीद होकर मरना पसंद करते थे। दोपहर में नमाज़ के बाद यज़ीद की सेना आप के काफिले पर हमला कर दिया। हज़रत इमाम हुसैन समेत 72 योद्धाओं ने यज़ीदियों से डट कर मुकाबला किया। जंग में आपके सभी योद्धा शहीद हो चुके थे तब अकेले इमाम हुसैन ही अकेले बचे थे बाकि कुछ महिलाएं जिनमे एक आपकी यानि हज़रत इमाम हुसैन की बीवी भी थी वह तम्बू में थे। तभी अचानक उनको अपने 6 महीने के बेटे अली असगर की आवाज़ सुनाई दी जो की 3 दिन से प्यास से तड़प रहा था । उनका बेटा भूक और प्यास से बेहाल था। उनकी माँ भी 3 दिन से भुकी प्यासी थी जिसकी वजह से दूध भी नहीं पिला पा रही थी। 

आप हज़रत इमाम हुसैन को अपने बेटे की यह हालत देखी नहीं गयी और वह उसे अपने हाथो में उठाकर कर्बला में ले गए। उन्होंने यज़ीद की सेना को अपने बेटे को थोड़ा पानी पिलाने के लिए कहा लेकिन उन्होंने पानी नहीं दिया और आपके बेटे के ऊपर तीर से वार कर दिया। जिससे आपके बेटे की उसी वक़्त मौत हो गयी और वह शहीद हो गए। उसके बाद यज़ीद की सेना ने भी हज़रत इमाम हुसैन को बहुत बुरी तरह से क़त्ल किया। इमाम हुसैन के शहीद होने के बाद उनका घोड़ा जिसका नाम जुलजनाह था वह तम्बू में आया। उसके जिस्म पर खून की निशान थे वह ज़ख़्मी भी था। तम्बू में आते ही वहां मौजूद महिलाएं समझ गयी थी की हज़रत इमाम हुसैन शहीद हो चुके हैं। हज़रत इमाम हुसैन के शहीद होने के बाद उनके घोड़े जुलजनाह के साथ क्या हुआ इसका कोई ज़िक्र या इसका कोई साबुत किताबों में नहीं आया हैं। यज़ीदियों ने तलवार से आप का मुबारक सर काटकर गली मोहल्लों में घुमाया था। उनका जुलुस निकाला गया था। ये देखकर हर किसी की आंख में आंसू थे सिवाय यज़ीदियों के। खैर इमाम हुसैन की शहादत को इस्लाम कभी भुला नहीं सकता। इनकी ही याद में मुहर्रम के महीने में मातम किया जाता है और हज़रत इमाम हुसैन और उनके परिवार की क़ुरबानी को याद किया जाता है। 

हमें भी चाहिए की मुहर्रम के महीने में उनकी शहादत को याद करें। मुहर्रम में ताजिया निकालकर ढोल नगाड़े बजाकर यज़ीदियों जैसे काम न करें।  जितना हो सके भूके प्यासे लोगों को खाना खिलाये।  मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को रोज़ा रखे और इमाम हुसैन की शहादत को याद करें। 


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Imran Siddiqui

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