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सर्वे के नाम पर संविधान का दमन बंद हो: रज़ा एकेडमी

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Stop suppressing the Constitution in the name of survey: Raza Academy

अजमेर शरीफ दरगाह और सदियों पुरानी मस्जिदों के खिलाफ सर्वेक्षण के नाम पर हो रहे कथित अन्याय ने देशभर में एक नई बहस छेड़ दी है। इस मुद्दे पर रज़ा एकेडमी और जमीअत उलमाए अहले सुन्नत ने खुलकर आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे संविधान और न्याय के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ बताया है।

मस्जिदों और धार्मिक स्थलों पर निशाना क्यों?

भारत का संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार और सम्मान प्रदान करता है। संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। इसके बावजूद, हाल के वर्षों में मस्जिदों और इस्लामिक धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद बढ़ते जा रहे हैं। कभी किसी ऐतिहासिक मस्जिद की जमीन पर दावा किया जाता है, तो कभी सर्वेक्षण के नाम पर इन स्थलों की धार्मिक स्वतंत्रता और पवित्रता को चुनौती दी जाती है।

अजमेर शरीफ दरगाह, जो सदियों से भाईचारे और सहिष्णुता का प्रतीक रही है, भी इस विवाद से अछूती नहीं रही। रज़ा एकेडमी का मानना है कि इस तरह के सर्वेक्षण संविधान के मूलभूत सिद्धांतों और धार्मिक स्थलों की पवित्रता का हनन हैं।

रज़ा एकेडमी की प्रतिक्रिया

रज़ा एकेडमी ने इस मामले पर एक कड़ा बयान जारी किया है।अल्हाज मोहम्मद सईद नूरी ने कहा कि देश में ऐसी गतिविधियां न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत करती हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द्र को भी नुकसान पहुंचाती हैं। संगठन ने शोहदा-ए-संभल मस्जिद के शहीदों के लिए दुआ करते हुए कहा कि अल्लाह तआला उनकी दरजात को बुलंद करे और उनके परिवारों को सब्र अता फरमाए।

रज़ा एकेडमी का कहना है कि मस्जिदें केवल इबादतगाह नहीं हैं, बल्कि वे इस्लामी संस्कृति और इतिहास की धरोहर हैं। इनका सम्मान करना हर नागरिक और सरकार का दायित्व है।

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क्या है सर्वे का उद्देश्य?


मस्जिदों पर सर्वेक्षण के पीछे क्या उद्देश्य है, यह एक बड़ा सवाल है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह धार्मिक स्थलों को निशाना बनाकर एक खास समुदाय को हाशिए पर डालने की साजिश है। इस तरह की कार्रवाइयों से समाज में विभाजन और तनाव बढ़ता है।

वहीं, प्रशासन का दावा है कि सर्वेक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को एकत्र करना और विवादित स्थलों पर स्पष्टता लाना है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह केवल एक धर्म विशेष के धार्मिक स्थलों पर ही लागू होता है?

संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा

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भारत का संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है। किसी भी धर्म या समुदाय को निशाना बनाना संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है। यदि धार्मिक स्थलों पर बार-बार सवाल उठाए जाएंगे और उनकी पवित्रता को चुनौती दी जाएगी, तो यह संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का सीधा उल्लंघन होगा।

इसके अलावा, 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम के अनुसार, किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को 15 अगस्त 1947 की स्थिति के आधार पर संरक्षित रखा जाएगा। इस अधिनियम का उद्देश्य धार्मिक स्थलों को विवादों से बचाना है।

सामाजिक सौहार्द्र पर प्रभाव


ऐसी घटनाएं समाज में सांप्रदायिक सौहार्द्र को बिगाड़ने का काम करती हैं। जब धार्मिक स्थलों पर विवाद पैदा होते हैं, तो इसका असर केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह समाज के हर पहलू पर पड़ता है।

रज़ा एकेडमी ने प्रशासन से अपील की है कि वह संविधान और न्याय के सिद्धांतों का पालन करे। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों की पवित्रता और सम्मान बनाए रखना सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

शोहदा-ए-संभल मस्जिद की घटना

रज़ा एकेडमी ने शोहदा-ए-संभल मस्जिद के शहीदों के लिए विशेष प्रार्थना की और उनके बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला उनके दरजात को बुलंद करे और उनके परिवारों को सब्र और हिम्मत प्रदान करे।

संभल मस्जिद की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया
है। इस घटना ने यह सवाल उठाया है कि धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और सम्मान को बनाए रखने के लिए क्या पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं।

आगे का रास्ता

रज़ा एकेडमी और जमीअत उलमाए अहले सुन्नत जैसे संगठनों का मानना है कि इस तरह के विवादों को खत्म करने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए। उन्हें चाहिए कि वह संविधान के मूलभूत सिद्धांतों और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करें।

साथ ही, समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि किसी भी धर्म या समुदाय को निशाना बनाना देश के लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों के खिलाफ है। धार्मिक स्थलों का सम्मान और उनकी पवित्रता बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।

निष्कर्ष

अजमेर शरीफ दरगाह और अन्य मस्जिदों के खिलाफ सर्वेक्षण के नाम पर जो विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह न केवल संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक सौहार्द्र को भी नुकसान पहुंचाता है। रज़ा एकेडमी और अन्य संगठनों की यह मांग पूरी तरह जायज़ है कि संविधान और धार्मिक स्थलों का सम्मान सुनिश्चित किया जाए।

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे ऐसे विवादों को खत्म करने के लिए त्वरित और प्रभावी कदम उठाएं। धार्मिक स्थलों की पवित्रता और सम्मान को बनाए रखने के साथ ही समाज में भाईचारा और सहिष्णुता को बढ़ावा देना ही देश के विकास और स्थिरता का असली रास्ता है।


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इमरान सिद्दीकी

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