इमाम अब्दुल्लाह बिन मुबारक: वह आलिम जो मैदान-ए-जंग में भी अव्वल थे
ऐसे होते हैं हमारे असलाह (सच्चे) उलेमा — जो इल्म में रहनुमा और जिहाद में भी पेशपेश होते हैं।
“अबदह अल-मरवज़ी” रिवायत करते हैं: हम एक बार इमाम अब्दुल्लाह बिन मुबारक के साथ रोम की सरज़मीन पर एक जिहादी मुहिम में शामिल थे। अचानक दुश्मन की सेना से आमना-सामना हो गया। जब दोनों सेनाओं ने मोर्चा संभाला, तो रोमियों की ओर से एक लंबा-चौड़ा, घमंडी और हथियारबंद योद्धा मुसलमानों को ललकारते हुए बोला:
“क्या कोई है जो मेरे मुकाबले में आ सके?”
इस्लामी फौज से एक-एक कर छह बहादुर सामने आए, लेकिन सभी शहीद हो गए। दुश्मन बार-बार चिल्लाता रहा: “और कोई है जो सामने आए?”
तभी एक नकाबपोश मुसलमान सामने आया। उसने रोमियों के उस लड़ाके को जबरदस्त लड़ाई में मात दी। फिर उसने तलवार लहराकर दुबारा ललकारा। इस तरह वह नकाबपोश कुल 6 रोमियों को पराजित कर विजयी होकर इस्लामी कतारों में लौट आया।
“अबदह अल-मरवज़ी” बताते हैं: “मैं उसकी हर हरकत देख रहा था। जब वह वापस लौटा तो मैंने उसका नकाब हटाया। देखा तो वह इमाम अब्दुल्लाह बिन मुबारक थे — हमारे ज़माने के महान आलिम, फकीह और मुहद्दिस।”
“उबैद बिन सनान” कहते हैं: “इमाम जिहाद में हमेशा सबसे आगे रहते थे लेकिन जब माल-ए-गनीमत का वक्त आता, तो वह नज़र नहीं आते। पूछने पर कहते:
‘जिसके लिए मैं लड़ता हूँ, वह मुझे देख रहा है!’
इमाम अब्दुल्लाह बिन मुबारक सिर्फ इल्म के नहीं, बहादुरी और इखलास के भी इमाम थे। उनसे मुजाहिदीन हदीस के साथ साथ बहादुरी भी सीखा करते थे।
स्रोत:
– किताब: मिरआतुल जमान — इब्न सआद
– किताब: तारीख बगदाद — खतीब बगदादी
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