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आला हजरत: इस्लाम का नूरानी चिराग

आला हजरत: इस्लाम का नूरानी चिराग और उनकी जिंदगी की मिसालें

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आला हजरत: इस्लाम का नूरानी चिराग

आला हजरत: इस्लाम का नूरानी चिराग और उनकी जिंदगी की मिसालें

बरेली, 10 अप्रैल 2025: अल्लाह तआला ने अपने दीन की हिफाजत और फैलावट के लिए कुछ खास बन्दों को चुना, जिनमें से एक थे इमाम अहमद रजा खान रहमतुल्लाह अलैह, जिन्हें प्यार और एहतराम से “आला हजरत” कहा जाता है। 14 जून 1856 (10 शव्वाल 1272 हिजरी) को हिंदुस्तान के बरेली शहर में पैदा हुए इस महान आलिम, सूफी और मुजद्दिद ने अपनी जिंदगी अल्लाह और उसके हबीब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की खिदमत में गुजार दी। वे बरेलवी जमात के बानी, कुरान-ओ-सुन्नत के मुहाफिज और सूफी राह के राही थे। उनकी जिंदगी इल्म, इबादत और इंसानियत की ऐसी मिसाल है जो आज भी हमें राह दिखाती है। आइए, उनकी जिंदगी के कुछ नक्शे और कारनामों को इस्लाम की रोशनी में देखें।

बचपन और तालीम: अल्लाह की रहमत का नजारा

आला हजरत का खानदान इल्म और तकवे का मरकज था। उनके वालिद मौलाना नकी अली खान और दादा मौलाना रजा अली खान अहल-ए-सुन्नत वल जमाअत की राह पर चलने वाले थे। उनकी पैदाइश से ही अल्लाह का करम नजर आता था। चार साल की नन्ही उम्र में उन्होंने कुरान-ए-पाक की तिलावत पूरी कर ली। एक बार उनकी वालिदा ने देखा कि वह रात के अंधेरे में कुरान पढ़ रहे थे। रोशनी कम थी, तो वालिदा ने फरमाया, “बेटा, रोशनी में पढ़ो, आंखों को तकलीफ होगी।” जवाब में नन्हे अहमद रजा ने कहा:

“अम्मी, अल्लाह की किताब को हर हाल में पढ़ना चाहिए। रोशनी बाहर से नहीं, दिल से आनी चाहिए।”

ये छोटा-सा वाकिया उनकी जिंदगी का वो उसूल बयान करता है जो आगे चलकर उनकी शख्सियत का हिस्सा बना। 13 साल, 10 महीने और 5 दिन की उम्र में उन्होंने दर्स-ए-निजामी का कोर्स पूरा किया, जिसमें कुरान की तफसीर, हदीस, फिक्ह, मंतिक (लॉजिक) और दूसरी इल्मी शाखाएं शामिल थीं। फिर मक्का और मदीना की तीर्थयात्रा पर गए, जहां शाह आले रसूल मरेहरवी, अहमद जैन दहलान मक्की और अब्दुर रहमान सिराज मक्की जैसे बड़े उलमा ने उनकी काबिलियत को देखकर हदीस और फिक्ह में इजाजतनामे दिए। उनकी याददाश्त ऐसी थी कि एक बार एक किताब को बस एक नजर देखकर पूरा याद कर लेते थे। ये अल्लाह का दिया हुआ इल्मी नूर था।

इल्मी खिदमात: दीन का खजाना

आला हजरत ने अपनी जिंदगी में 1,000 से ज्यादा किताबें लिखीं, जो अरबी, फारसी और उर्दू में हैं। ये किताबें इल्म का ऐसा खजाना हैं जो हर मुसलमान के लिए राहनुमा हैं। उनकी कुछ मशहूर रचनाएं इस तरह हैं:

1. फतावा रजविय्या: ये 30 जिल्दों में फैला हुआ 22,000 पन्नों का फतवों का मजमुआ है। इसमें हर छोटे-बड़े मसले का जवाब कुरान और हदीस की रोशनी में दिया गया। एक मिसाल ये है कि एक शख्स ने सवाल किया, “कागजी नोट जो सरकार छापती है, क्या उनका इस्तेमाल जायज है?” आला हजरत ने फरमाया, “अगर ये नोट माल की कीमत रखते हैं और लेन-देन का जरिया बनते हैं, तो शरीअत में जायज हैं।” इस जवाब से उनकी दूरअंदेशी और जमाने के साथ कदम मिलाने की समझ झलकती है।

2. कंज-उल-ईमान: कुरान का ये उर्दू तर्जुमा 1910 में पूरा हुआ। इसमें हर आयत को इस खूबसूरती से बयान किया गया कि रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अजमत हर लफ्ज में नजर आती है। मिसाल के तौर पर, सूरह अल-फील की तफसीर में उन्होंने लिखा, “अल्लाह ने अपने हबीब के मकाम की हिफाजत के लिए अबाबील भेजे।” ये तर्जुमा आज भी लाखों लोगों की जुबान पर है।

3. हदाइक-ए-बख्शिश: ये नातों का मजमुआ है, जो रसूल की शान में लिखा गया। एक नात में फरमाते हैं:

“हर सांस में बस तेरा जिक्र है यां रसूल, तेरे बगैर ये जिंदगी है बेकार की चूल।”
ये शेर उनकी मुहब्बत-ए-रसूल का आईना है।

4. इल्मी बहस: एक बार अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. जिया-उद-दीन ने एक मुश्किल गणित का सवाल उनके सामने रखा। आला हजरत ने चंद मिनटों में उसे हल कर दिया और फरमाया, “अल्लाह ने इल्म हर शक्ल में बांटा है, बस उसे ढूंढने की जरूरत है।” ये उनकी इल्मी गहराई को दिखाता है।

सूफियाना राह: अल्लाह और रसूल की मुहब्बत

आला हजरत कादिरी सिलसिले के सच्चे मुराद थे। 22 साल की उम्र में शाह आले रसूल मरेहरवी ने उन्हें अपना शिष्य बनाया और बाद में कादिरी, चिश्ती और नक्शबंदी सिलसिलों में खलीफा बनाया। उनकी इबादत का आलम ये था कि रमजान में एक बार उनकी वालिदा ने इफ्तार के लिए जोर दिया। जवाब में फरमाया:

“अम्मी, ये रोजा अल्लाह की बारगाह में पेश करना है, उसकी मर्जी के बगैर नहीं तोड़ सकता।”

उनकी जिंदगी का हर लम्हा रसूल की सुन्नत पर चलता था। एक बार एक सैयद शख्स उनके पास आया, जिसकी हालत बहुत खराब थी। उसने मदद मांगी। आला हजरत ने अपनी जेब से जो कुछ था, दे दिया और फरमाया:

“आप रसूल के खानदान से हैं, आपकी खिदमत मेरे लिए जन्नत का सबब है।”

ये उनकी अदा थी कि रसूल की नस्ल का एहतराम हर हाल में वाजिब समझते थे।

बरेलवी जमात: दीन की हिफाजत का जज्बा

उस दौर में कुछ लोग इस्लाम से सूफी रिवायतों को खत्म करना चाहते थे। आला हजरत ने बरेलवी जमात शुरू की ताकि मिलाद-उन-नबी, दरगाह की जियारत और संतों से वसीला जैसी सुन्नतों को बचाया जाए। उन्होंने फरमाया:

“रसूल की मुहब्बत का इजहार करना हर मोमिन का फर्ज है।”

एक बार एक बहस में किसी ने कहा कि मिलाद मनाना बिदअत है। आला हजरत ने जवाब दिया:

“जब रसूल की पैदाइश पर अल्लाह ने जन्नत सजाई, तो हमारा जश्न क्या बुरा है?”

आज उनकी जमात के 20 करोड़ से ज्यादा मानने वाले दुनिया भर में फैले हैं।

समाजी खिदमात: इंसानियत की मिसाल

1920 में हिंदुओं का शुद्धि आंदोलन चला, जिसका मकसद मुसलमानों को दीन से दूर करना था। आला हजरत ने “जमात रजा-ए-मुस्तफा” बनाकर इसका जवाब दिया और मुसलमानों को अपने ईमान पर कायम रखा। एक बार एक गरीब ने उनके पास आकर कहा, “मेरे पास खाने को कुछ नहीं।” आला हजरत ने अपना खाना उसे दे दिया और फरमाया:

“अल्लाह का बन्दा भूखा रहे, ये मुझे मंजूर नहीं।”

आखिरी सफर और यादगार

28 अक्टूबर 1921 (25 सफर 1340 हिजरी) को जुमे की अजान के बाद उनका इंतकाल हुआ। उस वक्त उनकी उम्र 65 साल थी। उनकी दरगाह बरेली शरीफ आज भी लाखों लोगों के लिए फैज का मरकज है। उनके बेटों हामिद रजा खान और मुस्तफा रजा खान ने उनकी राह को आगे बढ़ाया। हिंदुस्तान की हुकूमत ने 1995 में उनकी याद में डाक टिकट जारी किया।

खातमा: दुआ और सबक

आला हजरत रहमतुल्लाह अलैह इल्म का समंदर, तकवे का पहाड़ और मुहब्बत-ए-रसूल का नूर थे। उनकी जिंदगी कुरान की आयत “और जो अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करे, वही कामयाब है” (सूरह नूर: 52) की जिंदा तफसीर थी। अल्लाह तआला उनकी कब्र को जन्नत का बाग बनाए और हमें उनकी सीरत पर चलने की तौफीक दे। आमीन।

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इमरान सिद्दीकी

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