🕌 ईद-उल-अज़हा के दिनों में फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद ‘तक़्बीर-ए-तशरीक’ पढ़ना वाजिब — उम्मत को याद दिलाई गई सुन्नत
www.imranjalna.comईद-उल-अज़हा के पवित्र दिनों में मुसलमानों को अल्लाह की याद में मशगूल रहने की खास तालीम दी गई है। इन मुबारक दिनों में हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद तक़्बीर-ए-तशरीक पढ़ना एक सुन्नत और कई विद्वानों के अनुसार वाजिब अमल है, जो उम्मत की भलाई और अल्लाह की याद का ज़रिया है।
📿 क्या है तक़्बीर-ए-तशरीक?
اللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، لَا إِلٰهَ إِلَّا اللّٰهُ، وَاللّٰهُ أَكْبَرُ، اللّٰهُ أَكْبَرُ، وَلِلّٰهِ الْحَمْدُ
हिंदी उच्चारण: अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ला इलाहा इल्लल्लाहु वल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर व लिल्लाहिल हम्द
📌 कब और कितनी बार पढ़ी जाती है?
- 📅 9वीं ज़िल-हिज्जा की फ़ज्र से लेकर 13वीं ज़िल-हिज्जा की अस्र तक
- 🕋 हर फ़र्ज़ नमाज़ के बाद
- 👳♂️ मर्द ऊँची आवाज़ में पढ़ें, 👩🦱 औरतें धीमे स्वर में
- 🤲 जमाअत हो या अकेली नमाज़ — फ़र्ज़ के बाद पढ़ना ज़रूरी
📖 हदीसी रौशनी में इसकी अहमियत
इस तक़्बीर की शुरुआत हज़रत इब्राहीम अ. और हज़रत इस्माईल अ. की क़ुर्बानी की याद में हुई। यह अल्लाह की कबीराई (महानता) को जाहिर करने वाला एक अमल है। उलमा-ए-किराम ने इसे सुन्नत मुअक्कदा से लेकर वाजिब तक माना है।
🎙️ मौलाना गुलाम जिलानी मिस्बाही ने उम्मत को याद दिलाया:
“इन दिनों की सबसे बड़ी इबादत अल्लाह की तक़्बीरात को ऊँचा करने में है। हमें चाहिए कि इस सुन्नत को ज़िंदा करें और अपनी औलादों को भी इसकी तालीम दें।”
📢 http://www.imranjalna.com की तरफ़ से तमाम मुस्लिम भाइयों और बहनों से गुज़ारिश है कि इन पवित्र दिनों में तक़्बीर-ए-तशरीक को अपनाकर अपने दिलों को रौशन करें और अल्लाह की रहमतों को हासिल करें।
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