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अब निशाने पर सूफ़ियाओं की दरगाहें: एक साज़िश की परतें खुलती जा रही हैं

✍ गुलाम मुस्तफा नईमी | रोशन मुस्तकबिल, दिल्ली

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अब निशाने पर सूफ़ियाओं की दरगाहें: एक साज़िश की परतें खुलती जा रही हैं

✍ गुलाम मुस्तफा नईमी | रोशन मुस्तकबिल, दिल्ली


एक प्रोपेगेंडा फिल्म के झूठे और मनगढ़ंत इतिहास की आड़ में #भाजपा और उससे जुड़े #संगठन अब #औरंगज़ेब_आलमगीर की क़ब्र को हटाने, तोड़ने और वहां कूड़ाघर बनाने की मांग कर रहे हैं।

महाराष्ट्र से शुरू हुई यह #साज़िश अब उत्तर प्रदेश के बहराइच शरीफ तक पहुँच चुकी है, जहाँ #RSS कार्यकर्ता सैयद सालार मसूद ग़ाज़ी की मजार हटाने की मांग कर रहे हैं।

यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा — आशंका है कि यह मुहिम जल्द ही #सुलतान_ए_हिंद ख्वाजा गरीब नवाज़ तक पहुँच जाएगी।

मूल वजह सिर्फ एक नहीं, यह एक सुनियोजित साज़िश है!

यह सिर्फ एक फिल्म का असर नहीं है जो समय के साथ खत्म हो जाएगा, बल्कि #भाजपा और #ग़ुलाम_मीडिया का एक व्यवस्थित अभियान है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का बार-बार औरंगज़ेब की क़ब्र हटाने का बयान देना कोई सामान्य बयानबाज़ी नहीं बल्कि एक दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति है।

यह अभियान #सूफी_वली और इस्लामी दाईयों को भी निशाना बनाएगा।

अब ज़रूरी हैं कुछ ठोस कदम:

  • मदारिस के पाठ्यक्रम में मुस्लिम शासनकाल का इतिहास शामिल किया जाए।
  • बच्चों के लिए आसान भाषा में मुस्लिम इतिहास पर आधारित किताबें तैयार की जाएं।
  • इतिहास के विषयों पर शोध और स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया जाए।
  • तख़स्सुस फी अत-तारीख़ (स्पेशल कोर्स इन हिस्ट्री) शुरू किया जाए।
  • मुस्लिम शासकों पर सूचनात्मक पुस्तिकाएं स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित हों।
  • सूफियाओं की सेवाओं पर आधारित लेखन और पुस्तकें तैयार की जाएं।
  • सूफियों के शासकों से संबंधों की तार्किक व्याख्या की जाए।
  • विशेषज्ञों के विडियो व्याख्यान और रील बनाकर प्रचारित किए जाएं।
  • इतिहास के तथ्यों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके जवाब दिया जाए।
  • मुस्लिम शिक्षाविद सेमिनार, डिबेट, संवाद आयोजित करें और सोशल मीडिया से प्रसारित करें।

औरंगज़ेब की क़ब्र: सिर्फ एक निशाना नहीं, सूफ़ियाओं की मज़ारों की ढाल है

आज हमें पूरी गंभीरता के साथ #औरंगज़ेब_की_क़ब्र के मुद्दे पर सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी स्तर पर मजबूती से खड़ा होना होगा।

सेकुलर इतिहासकारों जैसे डॉ. राम पुनियानीडॉ. रुचिका शर्मा की सकारात्मक व्याख्याओं को जनसाधारण तक पहुंचाना होगा।

अगर आज हम चुप रहे, तो कल सूफ़िया और औलिया की मज़ारें भी इसी साज़िश का शिकार होंगी — और तब कुछ करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

उठ कि अब बज़्म-ए-जहां का और ही अंदाज़ है,
मशरिक़ और मग़रिब में तेरे दौर का आग़ाज़ है।

22 रमज़ानुल मुबारक 1446 हिजरी | 23 मार्च 2025, रविवार


#औरंगज़ेब_की_क़ब्र #ख्वाजा_गरीब_नवाज़ #सूफी_इतिहास #मुस्लिम_शासनकाल #इस्लामी_विरासत #RSS_साज़िश #इतिहास_बचाओ
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इमरान सिद्दीकी

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