Prayers for the fourth day of Ramadan: Seeking mercy, kindness and halal sustenance
रमज़ान के पाक महीने में हर दिन की अपनी खास अहमियत होती है। इस महीने में रोज़ेदार अल्लाह की रहमत, मग़फिरत (बख्शिश) और बरकत हासिल करने के लिए खास दुआएं पढ़ते हैं। चौथे दिन की दुआ अल्लाह से रहमत, करम और हलाल रिज़्क की तलब के लिए की जाती है। यह दुआ हमें दुनियावी और आख़िरत की भलाई के लिए बहुत फायदेमंद हो सकती है।
चौथे दिन की दुआ (अरबी में)
اللَّهُمَّ أَنْزِلْ عَلَيْنَا رَحْمَتَكَ، وَأَمْطِرْ عَلَيْنَا كَرَمَكَ، وَارْزُقْنَا الْحَلَالَ
हिंदी उच्चारण:
"अल्लाहुम्मा अंज़िल अलेना रहमतक, वा अम्तिर अलेना करमक, वा र्ज़ुकना अल-हलाल"
हिंदी अर्थ:
"ऐ अल्लाह! हम पर अपनी रहमतें नाज़िल फ़रमा, करम की बारिश फ़रमा और हमें हलाल रिज़्क अता फ़रमा।"
इस दुआ का मतलब और फायदे
1. अल्लाह की रहमत:
रहमत का मतलब अल्लाह की दया और कृपा है।
जब अल्लाह की रहमत होती है, तो इंसान की मुश्किलें हल हो जाती हैं और जिंदगी में सुकून आता है।
यह दुआ हमें अल्लाह की रहमत मांगने का तरीका सिखाती है ताकि हम दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हों।
2. अल्लाह का करम:
करम यानी अल्लाह की इनायत और फज़ल (विशेष कृपा)।
जब अल्लाह अपना करम करता है, तो इंसान को उम्मीद से ज्यादा मिलता है और हर मुश्किल आसान हो जाती है।
इस दुआ में हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि वह हम पर करम करे और हमें बेपनाह बरकतें अता फरमाए।
3. हलाल रिज़्क:
हलाल का मतलब है वह कमाई और खाना जो शरीयत के अनुसार सही और पाक-साफ हो।
हलाल रिज़्क खाने से दिल और दिमाग को सुकून मिलता है और दुआओं में असर होता है।
इस दुआ के जरिए हम अल्लाह से हलाल रोज़ी और बरकत की मांग करते हैं, जिससे हमारी दुनिया और आख़िरत सुधर जाए।
इस दुआ को कब और कैसे पढ़ें?
यह दुआ रमज़ान के चौथे दिन खासतौर पर पढ़ी जाती है।
इसे रोज़ा खोलने से पहले, नमाज़ के बाद या ताहज्जुद की नमाज़ में पढ़ सकते हैं।
इस दुआ को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी शामिल किया जा सकता है ताकि अल्लाह की रहमत और बरकत हमेशा बनी रहे।

निष्कर्ष
रमज़ान इबादत और तौबा करने का महीना है। यह वक्त अल्लाह से अपनी ज़िन्दगी के लिए रहमत, करम और हलाल कमाई मांगने का है। चौथे दिन की यह दुआ हमें सिखाती है कि हमें सिर्फ अपनी जरूरतें ही नहीं, बल्कि दुनिया और आखिरत की भलाई के लिए भी दुआ करनी चाहिए।
अल्लाह हम सबकी दुआएं कुबूल फरमाए! आमीन।
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