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तफ़्सीर:क़ुरआन का पाठ –

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क़ुरआन का पाठ – मुख्य अंश
अस्सलामु अलैकुम

ऐ अल्लाह, हमारे इल्म, रोज़ी और अमल में बरकत अता फ़रमा. क़ुरआन पढ़ने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा. आमीन

अऊज़ु बिल्लाहि मिनश शैतानिर्रजीम।
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम।
क़ालत इहदा-हुमा या अब्बति-स्ताजिर-हु, इन ख़ैरा मनिस-ताजर्ताल क़विय्युल अमीन।

अनुवाद:
उन दोनों औरतों में से एक ने कहा, “ऐ मेरे पिता! आप इन्हें मज़दूरी पर रख लीजिए. आप जिस किसी को भी मज़दूरी पर रखें, उसके लिए सबसे अच्छा व्यक्ति वही है जो ताक़तवर भी हो और ईमानदार भी।”

Translation:

One of the two women said, “My father, you should hire him as a labourer. Whoever you hire, the best person for that is one who is both strong and honest.”

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तफ़्सीर:
यह वही ख़ातून थीं जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को बुलाने गई थीं. उनका नाम सफ़ूरा था और फिर उन्हीं से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का निकाह हुआ. घर में एक ऐसे मर्द की ज़रूरत थी जो घर के बाहर के कामों की देखभाल करे और औरतों को बकरियाँ चराने और उन्हें पानी पिलाने की ज़रूरत न पड़े. इसलिए उन्होंने यह तजवीज़ पेश की कि आप इन्हें इस काम पर रख लें और इसकी बाक़ायदा मज़दूरी तय कर लें. और ख़ातून का यह जुमला कि “आप जिस किसी को भी मज़दूरी पर रखें, उसके लिए सबसे अच्छा व्यक्ति वही है जो ताक़तवर भी हो और ईमानदार भी”, उनकी कमाल अक़्लमंदी का सबूत है. अल्लाह तआला ने उनका यह जुमला नक़्ल फ़रमा कर मुलाज़मत के फ़ैसले के लिए बेहतरीन पैमाना अता फ़रमा दिया है कि एक अच्छे मुलाज़िम में यही दो बुनियादी ख़ूबियाँ होनी चाहिए: एक यह कि जो फ़राइज़ उसके सुपुर्द किए गए हैं, वह उनको बजा लाने की जिस्मानी और ज़ेहनी ताक़त रखता हो और दूसरे यह कि ईमानदार हो.

क़ाल इननी उरीदु अन उनक्किहका इहदल इब्नतय्या हातैनि अला अन ताजुरनी समानिया हिजज, फ़ा-इं अतम्ममता अशरन फ़ा-मिन इन्दिका, वमा उरीदु अन अशुक्क़ अलैका, सतजिदुनी इंशा-अल्लाहु मिनस्सालिहीन।

अनुवाद:
उनके पिता ने कहा, “मैं चाहता हूँ कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक से तुम्हारा निकाह कर दूँ, बशर्ते कि तुम आठ साल तक मज़दूरी पर मेरे पास काम करो. फिर अगर तुम दस साल पूरे कर दो तो यह तुम्हारा अपना फ़ैसला होगा. और मेरा कोई इरादा नहीं है कि तुम पर ज़्यादा मुश्किल काम डालूँ. इंशा-अल्लाह तुम मुझे उन लोगों में से पाओगे जो भलाई का मामला करते हैं.”

तफ़्सीर:

इस वक़्त तो हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने दोनों में से किसी एक बेटी की तईन (चुनाव) नहीं की, लेकिन जब बाक़ायदा निकाह हुआ तो मशहूर तरीक़े के मुताबिक़ हुआ. और मज़दूरी पर काम करने से मुराद बकरियाँ चराना था. बहुत से फ़ुक़हा और मुफ़स्सिरों ने यह क़रार दिया है कि बकरियाँ चराने को हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी बेटी का मेहर मुक़र्रर किया था, लेकिन इस पर अव्वल तो यह इशकाल पैदा होता है कि क्या बीवी का कोई काम करना मेहर बन सकता है या नहीं? इसमें फ़ुक़हा का इख़्तिलाफ़ है. दूसरे, यहाँ तो बीवी का नहीं, बल्कि बीवी के वालिद का काम करने का मुआहिदा हुआ था. जो हज़रात इस मुआहिदे को मेहर क़रार देते हैं, अगरचे उन्होंने इस इशकाल का भी जवाब देने की कोशिश की है, लेकिन वह तकल्लुफ़ से ख़ाली नहीं है. इसके बर-अक्स, कुछ मुफ़स्सिरों और फ़ुक़हा ने यह मौक़िफ़ इख़्तियार फ़रमाया है कि बकरियाँ चराना बतौर मेहर नहीं था, बल्कि यह दो अलग-अलग बातों की मुफ़ाहिमत (समझौता) थी. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम यह चाहते थे कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उनकी बकरियाँ भी चराएँ, जिसकी मज़दूरी अलग मुक़र्रर हो और उनकी बेटी से निकाह भी करें, जिसका मेहर अलग से क़ायदे के मुताबिक़ तय किया जाए. इन दोनों बातों के बारे में उनकी मर्ज़ी मालूम करने के लिए आपने दोनों बातें ज़िक्र फ़रमाईं, ताकि जब वह इन बातों को मंज़ूर करके वादा कर लें तो निकाह अपने तरीक़े से किया जाए, जिसमें लड़की का तईन भी हो, गवाह भी हों और मेहर भी मुक़र्रर किया जाए और मुलाज़मत का मुआहिदा अपने तरीक़े से किया जाए, जिसमें मज़दूरी बाक़ायदा मुक़र्रर की जाए. चुनांचे, यह दोनों मामले अपने-अपने अहकाम के मुताबिक़ अपने-अपने वक़्त पर अंजाम पाए और इस वक़्त सिर्फ़ इन मामलों को आइंदा वजूद में लाने का दोनों तरफ़ से वादा किया गया. लिहाज़ा, इस पर यह इशकाल भी नहीं हो सकता कि एक मामले को दूसरे मामले के साथ मशरूत किया गया है. यही मौक़िफ़ अल्लामा बदरुद्दीन ऐनी ने “शरह-ए-बुख़ारी” में इख़्तियार फ़रमाया है. (देखिए: “उम्दतुल क़ारी”, किताबुल इजारात, सफ़ा: 85, जिल्द: 12)


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इमरान सिद्दीकी

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