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हसनिया मस्जिद बुरहाननगर में १० दिवसीय जिक्र-ए-शोहदा-ए-कर्बला का आयोजन उत्साहपूर्वक संपन्न 

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* जमात रजा-ए-मुस्तफा की ओर से १० दिनों तक विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन  
* हजरत इमाम हुसैन (रज़ी) के मुए मुबारक की जियारत कराई गई

10-day Zikr-e-Shohada-e-Karbala event concluded enthusiastically at Hasaniya Mosque Burhannagar

जालना: जालना शहर के बुरहाननगर में स्थित हसनिया मस्जिद में, जमात रजा-ए-मुस्तफा शाखा जालना द्वारा १ मोहर्रम से १० मोहर्रम तक, यानी ८ जुलाई से १७ जुलाई तक, जिक्र-ए-शोहदा-ए-कर्बला कार्यक्रम उत्साह पूर्वक संपन्न किया गया. प्रतिदिन ईशा की नमाज के बाद विभिन्न विषयों पर नागरिकों का  मार्गदर्शन किया गया. बुधवार की सुबह, अकीदतमंदों ने हजरत इमाम हुसैन (रजी) के मुंह मुबारक की जियारत की और इसी के साथ लंगर-ए-इमाम हुसैन भी संपन्न हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया.

हजरत मौलाना मुफ्ती गुलाम नबी अमजदी ने प्रतिदिन विविध विषयों पर नागरिकों का मार्गदर्शन किया. पहले दिन अल्लाह तआला की तौहीद के बारे में बताया गया, फिर पैगंबर मुहम्मद (सअ) की सीरत पर प्रकाश डाला गया, खुलफाए राशिदीन की खिलाफत के बारे में बयान किया गया, और सहाबा-ए-किराम के मुकाम को हदीस की रोशनी में समझाया गया.

आखिरी तीन दिनों में कर्बला की कयामत समान घटनाओं का वर्णन किया गया है.  जिसमें बताया गया कि हजरत इमाम ए हुसैन (रजी) ने अपनी पूरी जिंदगी में पैगंबर मुहम्मद (सअ) के दीन को बचाने के लिए सबसे ज्यादा ताकीद फरमाई.  हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में केवल दीन-ए-इस्लाम की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार को कुर्बान कर दिया, यहां तक कि खुद को भी. उम्मत-ए-मुहम्मदी को उन्होंने यह संदेश दिया कि हमेशा सत्य पर अडिग रहें. दुनिया के लालच में आकर अपनी आखिरत को बर्बाद न करें. यजीदियों के तरीकों का अनुसरण कभी न करें. आज जो लोग शराब पीते हैं, जुआ खेलते हैं, सूद का व्यापार करते हैं या मुसलमानों को आपस में दबाने का काम करते हैं, वे यजीद के तरीकों पर हैं. इसलिए, यजीद के तरीकों को अपनाने से दीन में खराबी आती है. अपने समाज को इन सभी बुराइयों से बचाना जरूरी है. खासकर नौजवानों को यह जज्बा दिलाया जाना चाहिए कि वे दीन पर कायम रहें और इमाम हुसैन के जज्बे को अपने अंदर जगाएं.
बुधवार को यौमे आशूरा के दिन की महत्वपूर्णता समझाई गई.

इस दिन को यौमे आशूरा क्यों कहा जाता है, इसकी जानकारी देते हुए यह बताया गया कि १० मोहर्रम को हजरत आदम की तौबा कबूल हुई थी, और हजरत युनुस (अस) को मछली के पेट से जिंदा निकाला गया था. यह भी बताया गया कि यौमे आशूरा कर्बला के मैदान की घटना से पहले से मनाया जा रहा है. यहां तक कि जब रमजान के रोजे फर्ज नहीं थे, उस समय पैगंबर मुहम्मद (सअ) १ मोहर्रम से १० मोहर्रम तक रोजे रखते थे. आशुरा के संबंध में पैगंबर मुहम्मद (सअ) ने फरमाया कि तुम आशुरा का रोजा रखो क्योंकि इसी दिन कयामत कायम होगी.

बुधवार को अकीदतमंदो को हजरत  इमाम हुसैन (रजी) के मुंए मुबारक की जियारत कराई गई  और दिल को छू लेने वाली दुआ की गई. जिसमें देश की सलामती के लिए खास दुआ की गई. लंगर-ए-इमाम हुसैन का आयोजन कर खिचड़ा और शरबत वितरित किया गया.

जमात रजा ए मुस्तफा की पूरी टीम और नौजवानाने अहले सुन्नत बुरहान नगर के साथ गुलाम गौस, शेख दस्तगीर, अब्दुल रहीम परसुवाले, इब्राहीम परसुवाले, समाजसेवक हाजी अब्दुल रऊफ, साजिद बागवान सहित अन्य ने मेहनत की.


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Imran Siddiqui

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