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Fateh Makkah फ़तेह मक्का

मक्का  में  अबू  सुफ़ियान  बहुत  बेचैन  था  जैसे  आज  कुछ  होने वाला  है!वो  बड़बड़ाया  उसकी  नज़र  आसमान  की  तरफ़  बार बार  उठ रही  थी  उसकी  बीवी  हिंदा  जिसने  हज़रत  अमीर  हमज़ा ﺭﺿﻲ ﺍﻟﻠﻪ ﻋﻨﻪ  का  कलेजा  चबाया  थाउसकी  परेशांनी  देख  कर  उसके  पास  आ  गई ……..क्या  बात  है-?क्यों  परेशांन  हो -?अबू सुफियान चौका कुछ नहीं तबीयत घबरारही है!मैं ज़रा घूम कर आता हूँ वो ये कहता घर से बाहर निकला और मक्का के गलियों से घूमते घूमते वो इसकी हद तक पहुँच गया .

अचानक उसकी नज़र शहर से बाहर एक वसीअ मैदान परपड़ीहज़ारो मशालें रौशन थीलोगो की चहल पहल उसकी रौशनी में नज़र आ रही थीऔर भनभनाहट की आवाज़ थी जैसे सैकड़ो लोग धीमी आवाज़ में कुछ पढ़ रहे है!
उसका दिल धक से रह गया इसने फ़ैसला किया कि वो क़रीब जा कर देखेगा कि कौन लोग हैं?
इतना तो वो समझ चुका था के मक्का के लोग तो ग़ाफ़िलो कीनींद सो रहे हैं!और यक़ीनन ये लश्कर मक्का पर चढ़ाई के लिए ही आयाहै!
वो जानना चाहता था ये कौन लोग है ?
वो आहिस्ता आहिस्ता ओट लेता इस लश्कर के काफ़ी क़रीबपहुँच चूका था,
कुछ लोगो ने उसने पहचान भी लिया ये इसके अपने भी लोगथे जो मुसलमान हो चुके थे और मदीना हिजरत कर चुके थे।
इसका दिल डूब रहा था वो समझ गया था के ये लश्कर मुसलमानों का है,और यक़ीनन मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम अपने जाँ निसारोके साथ मक्का आ पहुँचे हैं
वो छुप कर हालात का जाएज़ा ले रहा था कि तभीउसकी गर्दन पर किसी ने तलवार रख दी इसकाऊपर का साँस ऊपर और नीचे का नीचे रह गया
लश्कर के पहरेदार ने उसे पकड़ लियाऔर अब उसें बारगाहे मुहम्मद सलल्लाहो अलैहे वसल्लम में ले जाया जा रहा था
उसका एक एक क़दम कई कई मन का हो चूका था और हर कदम पर उसे अपनेकरतूत याद आ रहे थेंजंग बद्र ,जंगे अहद ,खंदक ओ ख़ैबरसबउसकी आँखों के सामने नाच रहे थे।
उसे याद आ रहा था कि उसने कैसेसरदारान मक्का को इकट्ठा किया था मोहम्मद सलल्लाहो अलैहे वसल्लम को क़त्लकरने के लिए कैसे नजासी के दरबार में जाकर तक़रीरकी थी  कि  ये मुसलमान हमारे ग़ुलाम और बागी हैं!
इनको हमें वापस दो कैसे इसकी बीवी हिंदा नेअमीर हमज़ा को अपने ग़ुलाम के ज़रिये शहीद करवा करउनका सीना चाक कर के उनका कलेजा निकाल कर के चबाया था और
अब इसको,आप मोहम्मद सलल्लाहो अलैहे वसल्लम के सामने पेश किया जारहा थाइसे यक़ीन था कि इसकी रवायात केमुताबिक उस जैसे दहशत गर्द को फ़ौरन कत्ल कर दिया जाएगा 
उधर बारगाहे रहमतुल लील आलमीन में असहाब रदि अल्लाहू अन्हुम जमा थेऔर सुबह के अकदामात के बारे में बात चल रही थी किकिसी ने आकर अबू सुफियान की गिरफ़्तारीकी ख़बर दी।
खैमा में नारे तकबीर बुलंद हुआ अबू सुफियानकी गिरफ़्तारी बहुत बड़ी ख़बर औरक़ामयाबी थी
ख़ेमा में मौजूद उमर बिन खत्ताब रज़ियंल्लाहुउठ कर खड़े हुए और तलवार को म्यान से निकाल कर इंतेहाई जोश के आलम मेंबोलेइस बदबख़्त को क़त्ल कर देना चाहिए शुरू से सारे फ़साद की जड़यही हैं।
आपके चेहरे मुबारक रहमतुल लील आलमीन सलल्लाहोअलैहे वसल्लम पर तबस्सुम नमूदार हुआऔरआप सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम की (दिलो मेंउतरती हुई) आवाज़ गूँजी बैठ जाओ उमर! और उसे आने दो
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियंल्लाहु आँखों में गैज़ लिए हुक़्म रसूल कीईताअत में बैठ गए लेकिन उनके चेहरे की शुर्खी बतारही थी के उनका बस चलता तो अबु सुफियान के टुकड़े करडालते,

इतने में पहरेदार ने हाज़ीर होने की इजाज़तमाँगी इजाज़त मिलने पर अबु सुफ़ियान को रहमतुल्लिलआलमीन के सामने इस हाल में पेश किया गया के उसके हाथउसी के अमामे से इसकी पुस्त पर बंधे हुए थे
चेहरे की रंगत पिली पड़ गई थी
और उसकी आंखो में मौत के साए लहरा रहे थे
रहमतुल लील आलमीन ने देखा और कहा इसके हाथ खोलदो और इसको पानी पिलाओ ,बैठ जाओ अबु सुफियान …..
अबु सुफियान हारे हुए जुआरी की तरह गिरने के अंदाज़ मेंख़ेमा के फर्श पर बिछे कालीन पर बैठ गया
पानी पी कर इसको कुछ हौसला हुआ तो नज़र उठा करख़ेमा में मौजूद लोगो की तरफ़ देखा,
उमर बिन ख़त्ताब की आँखे गुस्से से सुर्ख थी
अबु बकर की आँखों में इसके लिए अफ़सोस का तासीर था
उस्मान बिन अफ़्फ़ान के चेहरे पर अज़ीज़दारी की तरह हमदर्दी और अफ़सोस का मिला जुलातासीर था
अली इब्ने अबू तालिब का चेहरा सपाट था
इसी तरह सभी के चेहरे देखते देखते आख़िरउसकी नज़र मोहम्मद रसूल अल्लाह सलल्लाहो अलैहे वसल्लम केचेहरे मुबारक पर आकर ठहर गई
“कहो अबु सुफियान कैसे आना हुआ-??”
अबु सुफियान के गले में जैसे आवाज़ नहींथी
बहुत हिम्मत कर के बोला मैं -मैं इस्लाम क़बुल करना चाहता हूँ
उमर बिन ख़त्ताब एक बार फ़िर उठ कर खड़े हुए या रसूल लल्लाह सलल्लाहोअलैहे वसल्लम ये शख्स मक्कारी कर रहा है!
जान बचाने के लिए इस्लाम कुबूल करना चाहता है!
मुझे इजाज़त दीजिये मैं आज इस दुश्मन अज़ली का खात्माकर दूँ आप के मुहँ से कैफ़ जारी था
“बैठ जाओ उमर” रिसालत मआब सलल्लाहो अलैहे वसल्लम ने नरमी से फ़िर फ़रमाया
“बोलो अबु सुफियान क्या तुम वाक़ई में इस्लाम क़बल करना चाहते हो????”
“जी..जी या रसूल लल्लाह सलल्लाहो अलैहे वसल्लम मैंइस्लाम क़बुल करना चाहता हूँ मैं समझ गया हूँ कि आप और आप का दींन सच्चा है!
इसका वादा पूरा हुआ मैं जान गया हूँ किसुबह मक्का को फ़तह होने से कोई नहीं बचा सकता -चेहरे मुबारक़रिसालत सलल्लाहो अलैहे वसल्लम पर मुस्कुराहट फ़ैली
“ठीक है! अबु सुफियान तो मैं तुम्हे इस्लाम की दावत देता हूँ औरतुम्हारी दरखास्त क़बूल करता हूँ जाओ तुम आज़ाद हो सुबह हममक्का में दाख़िल होंगें इंशा अल्लाह मैं तुम्हारे घर को जहाँ आज तक इस्लाम औरहमारे ख़िलाफ़ साजिशें होती थी जाए अमन क़रार देता हूँ जोतुम्हारे घर में पनाह ले लेगा वो महफूज़ है!”

अबु सुफियान की आँखे हैरत से फटी जा रहीथीं।
“और सुनो मक्का वालो से कहना जो बैततुल्लाह में दाख़िल हो गयाउसको अमान है”
“जो अपनी किसी इबादतगाह में चला गया उसको अमान हैं!”
“यहाँ तक कि जो अपने घरों में बैठ गया उसको भी अमान है!”
“जाओ अबु सुफियान जाओ जाकर सुबह हमारी आमद का इंतज़ार करो”
“और कहना मक्का वालो से कि हमारी कोई तलवार म्यान से बाहरनहीं होगी हमारा कोई तीर तरकश से बाहरनहीं होगा हमारा कोई नेज़ा किसी के तरफ़ सीधानहीं होगा जब तक के कोई हमारे साथ लड़ना नहीं चाहेगा”

अबु सुफियान ने हैरत से मोहम्मद सलल्लाहो अलैहे वसल्लम कीतरफ़ देखाऔरकाँपते हुए होठों से बोलना शुरू किया …”लाइलाहा इल्लल्लाह मोहम्मदर रसूलल्लाह” सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम
सब से पहले उमर बिन रज़ियंल्लाहु ख़त्ताब आगे बढे और अबु सुफियान को गलेलगा लिया
“मरहबा ऐ अबु सुफियान अब से तुम हमारे दीनीभाई हुए तुम्हरी जान माल हमारे ऊपर वैसे ही हराम होगया जैसा के हर मुसलमान का एक दूसरे पर हरांम है!”
“अल्लाह पाक़ तुम्हारी तमाम पिछली गुनाहों को मुआफ़ फ़रमाए”
अबु सुफियान हैरत से देख रहा था कि “ये कैसा दींन है?””ये कैसे लोग हैं?”
सब से मिल कर वो बाहर निकल गया वो दहशत गर्द अबु सुफियान जिस के शर सेमुसलमान आज तक तंग थे उन्ही के दरमियान से सलामतीसे गुजरता हुआ जा रहा था जहाँ से गुज़रता इसे इस्लामी लश्कर काहर फर्द हर सिपाही उस से बढ़ बढ़ कर मुसाफ़ा कर रहा था औरमुबारकबाद दे रहा था -अगले दिन मक्का शहर की हद पर जो लोग खड़ेथे उनमें सब से नुमाया अबु सुफियान था।

मुसलमानों का लश्कर मक्का में दाखिल हो चुका था किसी एक तलवारकिसी एक नेज़े किसी एक तीर कीनोक पर ख़ून का एक कतरा भी नहीं था
लश्कर इस्लाम को हिदायत मिल चुकी थीकिसी के घर में दाख़िल मत होनाकिसी के इबादतगाह को नुक्सान मत पहुँचानाकिसी का पीछा मत करना औरत और बच्चों पर हाथ नउठाना किसी का माल न लूटना,
हजऱत बिलाल हब्शी रदिअल्लाहो अन्ह आगे आगे एलान करते जा रहें थे,”मक्का वालो रसूल ए खुदा की तरफ़ से तुम सब के लिए आममुआफ़ी का ऐलान है!जो इस्लाम क़बुल करना चाहता है!वो कर सकता है!जो न करना चाहे वो अपने साबका दींन पर रह सकता है!सब को उनके मज़हब के मुताबिक इबादत की खुली इजाज़तहै!सिर्फ़ मस्जिदे हरम और उसकी हदुद के अंदर बुतपरस्ती की इजाज़त नहीं होगीकिसी का ज़रिया मॉस छीना नहीं जाएगाकिसी को उसकी जाएयदाद से महरूम नहीं कियाजाएगाग़ैर मुसलमानों के जान और माल की हिफाज़त मुसलमान करेंगेंऐ मक्का के लोगो …….”

हिंदा अपने दरवाज़े से लश्करे इस्लाम को जाते देख रहीथी,उसका दिल गवाही नहीं दे रहा था कि हज़रत हमज़ा काक़त्ल इसको मुआफ़ कर दिया जाएगा।
लेकिन अबु सुफियान ने तो रात में यही कहा था के इस्लाम क़बूल कर लोसब गलतियां मुआफ़ हो जाएंगीमक्का फ़तह हो चूका था
बिना ज़ुल्म किये बिना खून बहाए बिना तीर तलवार चलाए,
लोग जोक़ दर जोक़ इस अफ़ाक़ी मज़हब को अख़्तेयार करने औरअल्लाह की तौहीद और रसूल अल्लाह सलल्लाहो अलैहेवसल्लम की रिसालत का इक़रार करने मस्जिदे हरम कीसेहन में जमा हो रहे थे और तभी मक्का वालो ने देखा इस हुजूम मेंहिंदा भी है!
कोन हिन्दा-?
वो जिसने आपके सगे चचा का उनकी शहादत के बाद कलेजा निकाल कर चबाया था,
अल्लाहु अक़बर ये हुआ करता है इस्लाम यह है इसकीतालिमात ये सिखाया था आप सलल्लाहो अलैहे वसल्लमने …


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Imran Siddiqui

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