कुर्बानी का इस्लामिक हुक्म और शरई नियम — कुरआन और हदीस की रौशनी में
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ईद-उल-अज़हा की सबसे प्रमुख और विशेष इबादत है “कुर्बानी” — जो कि इस्लाम में एक सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। यह एक ऐसी इबादत है जिसमें एक मुसलमान अल्लाह की रज़ा के लिए जानवर की कुर्बानी देता है और इसे ईमान की गहराई से जोड़कर देखा जाता है।
कुर्बानी का हुक्म क्या है?
अधिकतर इस्लामी विद्वानों के अनुसार कुर्बानी एक वाजिब इबादत है, विशेष रूप से उन लोगों पर जो:
- मुक़ीम हों (मुसाफिर न हों)
- बालिग़ और समझदार हों
- निसाब के मालिक हों (सालाना ज़रूरी आय से अधिक)
कुरआन की रौशनी में
“और हर उम्मत के लिए हमने कुर्बानी का एक नियम तय किया ताकि वे अल्लाह का नाम लें उन जानवरों पर जिन्हें उसने उन्हें दिया है।”
— सूरह अल-हज 22:34
हदीस की रौशनी में
रसूलुल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया:
“जिसके पास कुर्बानी करने की सामर्थ्य हो और वह न करे, वह हमारी ईदगाह के क़रीब न आए।”
— इब्ने माजा: 3123
शरई नियम और शर्तें
- जानवर हलाल और स्वस्थ होना चाहिए
- उम्र: बकरा/बकरी (1 साल), बैल/भैंस (2 साल), ऊंट (5 साल)
- कुर्बानी 10 ज़िलहिज्जा की नमाज़ के बाद से 12 तारीख की शाम तक कर सकते हैं
- नियत और अल्लाह के नाम के साथ ज़बह करना जरूरी है
कुर्बानी के जानवर में खामियां मना हैं
ऐसे जानवर की कुर्बानी जायज़ नहीं है जो:
- अंधा हो या एक आंख से बहुत कम देखता हो
- बहुत दुबला हो या बीमार हो
- लंगड़ा हो और चलने में मुश्किल हो
साझा कुर्बानी के नियम
बैल और ऊंट की कुर्बानी में अधिकतम 7 लोगों की साझेदारी हो सकती है, लेकिन:
- हर साझेदार की नियत सिर्फ अल्लाह की रज़ा होनी चाहिए
- हर हिस्सा बराबर बांटना ज़रूरी है
निष्कर्ष
कुर्बानी केवल जानवर की जान लेने का नाम नहीं, बल्कि यह एक आत्मिक समर्पण, अल्लाह की आज्ञा पालन और समाज की सेवा का ज़रिया है। इसे पूरे इख़्लास और सही शरई तरीके से अदा करें ताकि यह इबादत कुबूल हो।
http://www.imranjalna.com | कुरआन, सुन्नत और इस्लामी विचारों की आवाज़

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